LAW'S VERDICT

OBC Reservation Case: 15 जुलाई से रोजाना हाईकोर्ट में होगी सुनवाई

हाईकोर्ट ने तय की नई टाइमलाइन; 91 याचिकाओं पर टिकी लाखों अभ्यर्थियों की नजर

जबलपुर। मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के विवाद पर अब सुनवाई की रफ्तार तेज होने जा रही है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने इस बहुचर्चित मामले से जुड़ी 91 याचिकाओं पर 15 जुलाई 2026 से प्रतिदिन दोपहर 2:30 बजे सुनवाई करने का निर्णय लिया है। बुधवार को जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की डिवीजन बेंच ने मामले की नई टाइमलाइन तय करते हुए नियमित सुनवाई का कार्यक्रम निर्धारित किया।

2019 में 14% से बढ़ाकर 27% किया गया था OBC आरक्षण

मामला वर्ष 2019 में तत्कालीन Kamal Nath सरकार द्वारा OBC आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने से जुड़ा है। राज्य विधानसभा ने 8 जुलाई 2019 को इस संबंध में विधेयक पारित किया था, जिसके बाद 17 जुलाई 2019 को इसका राजपत्र (गजट) अधिसूचना प्रकाशित की गई थी।

इस निर्णय को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें तर्क दिया गया कि आरक्षण की सीमा बढ़ाना संविधान और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा संबंधी सिद्धांतों के विपरीत है। वहीं दूसरी ओर कई याचिकाकर्ताओं ने बढ़े हुए आरक्षण का समर्थन करते हुए इसे सामाजिक न्याय की दिशा में आवश्यक कदम बताया है।

पक्ष और विपक्ष में दायर हैं 91 याचिकाएं

हाईकोर्ट में दाखिल कुल 91 याचिकाओं में एक पक्ष OBC आरक्षण को 27 प्रतिशत बनाए रखने की मांग कर रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे असंवैधानिक बताते हुए निरस्त करने की मांग कर रहा है। प्रमुख याचिकाओं में अशिता दुबे और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं शामिल हैं।

सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने रखा पक्ष

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान OBC आरक्षण का विरोध कर रहे पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी उपस्थित हुए। वहीं बढ़े हुए आरक्षण के समर्थन में Youth For Equality की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर पी सिंह ने पक्ष रखा। राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह अदालत में उपस्थित रहे।

लाखों अभ्यर्थियों और भर्तियों पर पड़ सकता है असर

OBC आरक्षण से जुड़ा यह मामला प्रदेश की विभिन्न सरकारी भर्तियों, चयन प्रक्रियाओं और आरक्षण नीति पर सीधा प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि लाखों अभ्यर्थियों, कर्मचारियों और सामाजिक संगठनों की निगाहें अब 15 जुलाई से शुरू होने वाली नियमित सुनवाई पर टिकी हुई हैं।

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