निजी व्यक्तियों को नहीं बनाया पक्षकार
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि जिन निजी व्यक्तियों पर भूमि पर कब्जा कर खनन करने का आरोप लगाया गया है, उन्हें याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का मुख्य आरोप निजी व्यक्तियों द्वारा उसके नागरिक और संपत्ति संबंधी अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ा है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में रिट याचिका आमतौर पर सुनवाई योग्य नहीं होती और इसके लिए सिविल न्यायालय में मुकदमा दायर करना ही उचित कानूनी उपाय है।
अंतरिम संरक्षण देने से भी इनकार
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी अनुरोध किया गया कि सिविल कोर्ट में वाद दायर किए जाने तक उसकी भूमि और कब्जे को संरक्षण दिया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने यह मांग अस्वीकार कर दी।
अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता को वैकल्पिक वैधानिक उपाय अपनाने के लिए भेजा जा रहा है, तब रिट अधिकारिता का उपयोग करते हुए अंतरिम आदेश या अस्थायी निषेधाज्ञा नहीं दी जा सकती।
सिविल कोर्ट स्वतंत्र रूप से करेगा सुनवाई
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करता है तो संबंधित न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला करेगा। हाईकोर्ट द्वारा याचिका नहीं सुने जाने का प्रभाव मामले की सुनवाई पर नहीं पड़ेगा। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता राजेंद्र जैन ने पक्ष रखा।
फैसले का महत्व
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि निजी भूमि विवाद, अतिक्रमण और कब्जे से जुड़े मामलों में सीधे रिट याचिका दाखिल करने के बजाय सिविल न्यायालय का दरवाजा खटखटाना अधिक उपयुक्त और प्रभावी कानूनी उपाय है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-19938-2026
