जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विभागीय आदेश के जरिए लेबर कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने की कोशिश पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि यदि किसी अधिकारी को न्यायालय के आदेश से असहमति थी तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत उच्च मंच पर चुनौती दी जानी चाहिए थी, न कि विभागीय आदेश जारी कर अदालत के फैसले को ही पलटने का प्रयास किया जाता।
हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच ने Food Corporation of India (FCI) से पूछा है कि इस तरह का "दुस्साहस" करने वाले अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। अदालत ने तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
नियमितीकरण विवाद से जुड़ा मामला
मामला जबलपुर के कर्मचारी अर्जुन पटेल और अब्दुल खालिद दानिश के नियमितीकरण से संबंधित है। लेबर कोर्ट ने दोनों कर्मचारियों के पक्ष में नियमितीकरण का आदेश पारित किया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए एफसीआई ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 10 सितंबर 2025 को लेबर कोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन किया था। इसके बाद एफसीआई ने डिवीजन बेंच के समक्ष रिट अपील दायर की।
देरी पर कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस दीपक खोत की बेंच ने एफसीआई से पूछा कि लेबर कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करने में इतनी देरी क्यों हुई।
इस पर एफसीआई की ओर से बताया गया कि अधिकारियों ने लेबर कोर्ट के आदेश के बावजूद एक विभागीय आदेश जारी कर दिया था। बाद में जब लेबर कोर्ट में चल रही वसूली कार्यवाही को रोकने का आवेदन और उसकी पुनरीक्षण याचिका भी खारिज हो गई, तब अपील दायर की गई।
"कानूनी प्रक्रिया का मजाक नहीं बना सकते"
इस जवाब पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि अधिकारियों को लेबर कोर्ट के आदेश से आपत्ति थी तो उन्हें नियमानुसार इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल या सक्षम न्यायिक मंच पर चुनौती देनी चाहिए थी।
अदालत ने कहा कि किसी विभागीय आदेश के माध्यम से न्यायालय के आदेश को शून्य करने का प्रयास कानून के शासन के विपरीत है और यह न्यायिक प्रक्रिया का उपहास उड़ाने जैसा है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का हवाला
बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करना सरकार और संस्थानों की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों की मनमानी के कारण अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ती है और न्यायिक समय की बर्बादी होती है।
केवल शो-कॉज नोटिस से नहीं चलेगा काम
सुनवाई के दौरान एफसीआई ने अदालत से कार्रवाई का विवरण पेश करने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी करने जैसी औपचारिक जानकारी पर्याप्त नहीं होगी।
अदालत ने निर्देश दिया कि एफसीआई को यह बताना होगा कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ अंतिम रूप से क्या कार्रवाई की गई है और उनकी जवाबदेही किस प्रकार तय की गई।
3 सप्ताह बाद फिर होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने एफसीआई को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई निर्धारित कर दी है। अब अदालत यह देखेगी कि न्यायिक आदेश को दरकिनार करने की कोशिश करने वाले अधिकारियों के खिलाफ वास्तव में क्या कार्रवाई की गई।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WA-1864-2026
