हाईकोर्ट ने दंपती की याचिका खारिज कर कहा- “सिर्फ आशंका के आधार पर नहीं मिल सकती स्थायी पुलिस सुरक्षा”
2019 में आर्य समाज मंदिर में हुई थी शादी
याचिका के अनुसार रतलाम में रहने वाली महिला चिकित्सक मूल रूप से मुस्लिम धर्म से थी, जिसने अपनी इच्छा से हिंदू धर्म अपनाकर वर्ष 2019 में दिल्ली के आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह किया था। दंपती के दो बच्चे भी हैं।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि विवाह और धर्म परिवर्तन की जानकारी मिलने के बाद महिला के परिवार और अन्य लोगों से लगातार जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं।
पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा था दंपती
दंपती ने बताया कि वर्ष 2022 में उन्होंने Madhya Pradesh High Court में याचिका दायर की थी, जिसके बाद एसपी रतलाम को सुरक्षा संबंधी प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने के निर्देश दिए गए थे और सुरक्षा उपलब्ध कराई गई थी।
हालांकि बाद में कथित रूप से संदिग्ध गतिविधियां बढ़ीं। याचिका में आरोप लगाया गया कि अज्ञात लोग उनके घर के आसपास निगरानी करते दिखे, बिना नंबर की बाइक और संदिग्ध वाहन घर के आसपास घूमते पाए गए। सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों ने भी इसकी रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को दी थी।
“गनमैन हटाकर होमगार्ड तैनात किया”
दंपती ने कोर्ट को बताया कि 13 अप्रैल 2026 को प्रशासन ने बिना कारण बताए उनके लिए तैनात सशस्त्र गनमैन हटा दिया और उसकी जगह बिना हथियार वाले होमगार्ड जवान को तैनात कर दिया, जिसके पास मोबाइल फोन तक नहीं था।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि हाल के समय में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह करने वाले दंपती लगातार पुलिस सुरक्षा की मांग लेकर याचिकाएं दायर कर रहे हैं, जबकि कई मामलों में “स्पष्ट और ठोस खतरे” के पर्याप्त प्रमाण नहीं होते।
अदालत ने कहा—
“सिर्फ संदिग्ध वाहनों के घूमने या सामान्य आशंकाओं के आधार पर स्थायी सशस्त्र सुरक्षा नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में नियमित पुलिस पेट्रोलिंग और जांच पर्याप्त उपाय हैं।”
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन जरूरी
हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन को निर्देशित किया कि जब भी ऐसी शिकायतें मिलें, तो वे Lata Singh Vs State of Uttar Pradesh और Shakti Vahini vs Union of India में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें।
याचिका खारिज, जरूरत पड़ने पर पुलिस से संपर्क की छूट
अदालत ने अंत में कहा कि याचिकाकर्ता किसी भी खतरे की स्थिति में स्थानीय पुलिस से सहायता मांगने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन कोर्ट सुरक्षा व्यवस्था तय करने वाला मंच नहीं बन सकता। इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।
हाईकोर्ट का आदेश देखें W.P. No. 14252/2026
