हाईकोर्ट ने कहा- “ईमानदार अफसरों का मनोबल नहीं तोड़ा जा सकता”
इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इंदौर ग्रामीण पुलिस के थाना प्रभारी (SHO) लोकेन्द्र सिंह हिहोरे को बड़ी राहत देते हुए उनका निलंबन आदेश रद्द कर दिया है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की कोर्ट ने कहा कि यदि इस प्रकार ईमानदारी से कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारियों को दंडित किया जाएगा, तो भविष्य में कोई अधिकारी अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई करने का साहस नहीं करेगा।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस ने पाया कि थाना प्रभारी द्वारा की गई कार्रवाई विधिसम्मत थी और उन्हें केवल इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन्होंने कथित दबाव के बावजूद FIR में वास्तविक घटनास्थल का उल्लेख किया।
आईएएस के फार्म हाउस पर पकड़ा था जुआ
याचिकाकर्ता लोकेन्द्र सिंह हिहोरे 2007 बैच के सब-इंस्पेक्टर हैं, जो घटना के समय थाना मानपुर, जिला इंदौर में SHO के पद पर पदस्थ थे। याचिका के अनुसार 10-11 मार्च 2026 की रात नियमित गश्त के दौरान उन्हें मुखबिर से सूचना मिली कि ग्राम अवलीपुरा स्थित ‘कोठी निवास’ फार्महाउस में बड़े स्तर पर जुआ संचालित हो रहा है।
सूचना मिलते ही SHO ने सर्च वारंट लेकर पुलिस बल और स्वतंत्र गवाहों के साथ रेड की। कार्रवाई में 20 से अधिक लोग जुआ खेलते पाए गए तथा मौके से नगदी, मोबाइल फोन और वाहन जब्त किए गए। बाद में पता चला कि फार्महाउस एक वर्तमान IAS अधिकारी का है, जो इंदौर में एमपी फाइनेंस कॉर्पोरेशन में प्रबंध संचालक के पद पर पदस्थ हैं।
FIR बदलने का दबाव, फिर सस्पेंशन
याचिका में दावा किया गया कि रेड के बाद SHO पर FIR दर्ज नहीं करने और घटनास्थल बदलने का दबाव बनाया गया। हालांकि उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और वास्तविक स्थान का उल्लेख करते हुए FIR दर्ज कराई। इसके अगले ही दिन 11 मार्च 2026 को उन्हें निलंबित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता मिनी रवीन्द्रन ने अदालत को बताया कि लोकेन्द्र सिंह का सेवा रिकॉर्ड उत्कृष्ट रहा है और उन्हें 300 से अधिक पुरस्कार मिल चुके हैं। यहां तक कि चर्चित “जैम गेट” मामले में जांच के लिए FBI और अमेरिकी दूतावास से भी प्रशंसा पत्र प्राप्त हुए थे।
कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने पाया कि निलंबन आदेश में किसी गंभीर कदाचार, अनुशासनहीनता या आदेश उल्लंघन का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी ने मुखबिर सूचना पर त्वरित कार्रवाई कर अवैध जुआ संचालन पकड़ा, ऐसे में इसे “गंभीर misconduct” नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एक सहायक उपनिरीक्षक (ASI) को भी निलंबित कर दिया गया, जबकि वह घटना के दिन मेडिकल लीव पर था। इसे अदालत ने “स्पष्ट non-application of mind” बताया।
“तो कोई अफसर साहस नहीं कर पायेगा”
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि SHO को घटना की पूर्व जानकारी थी या उन्होंने किसी आदेश की अवहेलना की। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए “दबाव” और “दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई” के आरोपों का राज्य ने स्पष्ट खंडन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे “स्टिरियोटाइप सस्पेंशन आदेश” जारी होते रहे, तो कोई भी पुलिस अधिकारी अवैध गतिविधियों पर रेड करने का साहस नहीं करेगा।
निलंबन आदेश रद्द
अंततः हाईकोर्ट ने 11 मार्च 2026 को इंदौर ग्रामीण पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी निलंबन आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही, निलंबन से जुड़ी सभी परिणामी कार्रवाइयों को भी रद्द कर दिया गया। हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकार को कानून के अनुसार आगे उचित कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें W.P. No. 10092/2026
