मुख्य आरोपी अमित को 5 साल की सजा सुनाकर हाईकोर्ट ने सीधे भेजा जेल
रेलवे क्रॉसिंग पर चली थी गोली
घटना 8 अप्रैल 2013 की है, जब फरियादी सलीमुद्दीन रेलवे क्रॉसिंग (परतला, छिंदवाड़ा) पर रुका हुआ था। उसी दौरान पीछे से एक कार (इंडिका) आई। पुरानी रंजिश के चलते आरोपी अमित तुलसयान ने कट्टे से सलीमुद्दीन पर फायर किया। गोली फरियादी की पीठ में लगी। एफआईआर तुरंत दर्ज हुई और मामले में कई आरोपियों को नामजद किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने किया था बरी
ट्रायल कोर्ट ने सभी पाँचों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ दाखिल राज्य सरकार की अपील पर हाईकोर्ट ने पाया कि आई-विटनेस (चश्मदीद गवाह) मौजूद हैं। मेडिकल रिपोर्ट से गोली लगने की पुष्टि होती है। मुख्य आरोपी की पहचान स्पष्ट है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से “अलिबी” (घटना के समय कहीं और होने का दावा) को मान लिया।
अलिबी साबित नहीं कर पाया आरोपी
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी ने दावा किया कि वह घटना के समय इंदौर के अस्पताल में भर्ती था, लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं किया गया। न एडमिशन रिकॉर्ड और न ही डिस्चार्ज पेपर। कोर्ट ने साफ कहा कि अलिबी साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी की होती है, जो वह निभा नहीं पाया।
पुलिस की जांच पर भी उठे सवाल
कोर्ट ने जांच अधिकारी एचआर पांडेय की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। विवेचना अधिकारी ने घटना में इस्तेमाल हथियार बरामद नहीं किया। इंदौर में मुख्य आरोपी के भर्ती होने की जांच अधूरी छोड़ी गई। महत्वपूर्ण साक्ष्य कोर्ट में पेश नहीं किए गए। कोर्ट ने इसे “खराब और संदिग्ध जांच” बताया।
गेटमैन की गवाही भी बेअसर
रेलवे गेट पर मौजूद गेटमैन की गवाही को भी कोर्ट ने कमजोर माना। गेटमैन ने सिर्फ आवाज सुनने और लोगों को भागते देखने की बात कही थी। उसने आरोपी को फायर करते नहीं देखा। इसलिए उसकी गवाही से आरोपियों को फायदा नहीं मिल सका।
केवल अमित दोषी, बाकी आरोपियों को राहत
हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य आरोपी अमित के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन अन्य आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य नहीं हैं। ऐसे में अमित को 5 साल की सजा दी गई। अन्य सभी आरोपियों की बरी होने की स्थिति हाईकोर्ट ने यथावत रखी है।
कमजोर जांच से नहीं बचेगा अपराधी
इस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सिर्फ तकनीकी खामियों के आधार पर आरोपी नहीं बच सकते। यदि सबूत मजबूत हैं, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सजा दे सकता है। अलिबी जैसे बचाव तभी मान्य होंगे जब ठोस प्रमाण हों।
हाईकोर्ट का आदेश देखें CRA-1651-2016
