बीसीआई की याचिका पर नोटिस, अवमानना से लेकर लाइसेंस सस्पेंशन तक खतरा, डीके जैन बोले: ‘इस्तीफा दे रहा हूं, पर साजिश का करूंगा खुलासा’
जबलपुर। देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन जबलपुर के अध्यक्ष डीके जैन पर सख्त रुख अपनाते हुए शोकॉज नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई Bar Council of India (बीसीआई) की याचिका पर की गई है, जिसमें जैन पर जस्टिस सुधांशु धूलिया के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का गंभीर आरोप लगाया गया है। गुरुवार को चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए जैन से जवाब तलब किया है। अगली सुनवाई 27 जुलाई को निर्धारित की गई है। इधर गुरवार की शाम को डीके ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने का एलान कर दिया। उन्होंने कहा है कि वे इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाएंगे। अभी तक देश के प्रधान न्यायाधीश के सामने एक ही पक्ष रखा गया है। अब वो खुद सीजेआई को हकीकत से रूबरू कराएंगे।
तीन बड़े सवालों में फंसे जैन- करियर पर संकट
सुनवाई के दौर बीसीआई की और से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरुकृष्ण कुमार, एडवोकेट ऑन रिकार्ड राधिका गौतम व अधिवक्ता अंजुल द्विवेदी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने डीके जैन से बेहद कड़े सवाल पूछे हैं, जो उनके पेशेवर भविष्य पर सीधा असर डाल सकते हैं:
- क्यों न उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की जाए?
- क्यों न उनका वकालत का लाइसेंस निलंबित किया जाए?
- क्यों न उन्हें हाईकोर्ट बार अध्यक्ष पद से हटाया जाए?
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि आरोप साबित होते हैं तो यह कार्रवाई डीके जैन के करियर के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है।
जैन का पलटवार—“इस्तीफा दे रहा हूं, अब सच्चाई सबके सामने लाऊंगा”
नोटिस जारी होने के कुछ घंटों के बाद ही डीके जैन ने गुरुवार की शाम को बड़ा कदम उठाते हुए नैतिक आधार पर अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी है। उन्होंने कहा कि वे अगली सुनवाई में देश के प्रधान न्यायाधीश के सामने पूरी सच्चाई रखेंगे और बताएंगे कि उनके खिलाफ किस तरह यह पूरी “साजिश” रची गई है।
कैसे भड़का पूरा विवाद? चुनाव से कोर्ट तक की लड़ाई
यह पूरा मामला मप्र स्टेट बार काउंसिल चुनाव के नामांकन विवाद से शुरू हुआ था। बीसीआई के नियम के अनुसार, बार एसोसिएशन के पदाधिकारी चुनाव नहीं लड़ सकते थे। इस नियम को चुनौती देते हुए जैन समेत अन्य पदाधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने नियम को “अनुचित” मानते हुए संशोधन के निर्देश दिए थे। इसके बाद पदाधिकारियों ने नामांकन तो भर दिए, लेकिन मामला यहीं नहीं थमा।
धूलिया कमेटी का फैसला- पुराना नियम ही होगा लागू
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई जस्टिस धूलिया की राष्ट्र स्तरीय कमेटी ने स्पष्ट किया था कि संशोधित नियम की अधिसूचना जारी नहीं हुई है, इसलिए पुराना नियम ही लागू माना जाएगा। इसी आधार पर मप्र स्टेट बार कॉउंसिल की चुनाव कमिटी ने 11 पदाधिकारियों के नामांकन निरस्त कर दिए थे। साथ ही आपराधिक मामलों वाले 8 अन्य उम्मीदवारों के नामांकन भी रद्द कर दिए गए।
जैन का आरोप- “10 साल तक चुप, अब कार्रवाई क्यों?”
इस घटनाक्रम के फौरन बाद 17 अप्रैल को डीके जैन ने एक पत्रकार वार्ता में इस कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा कि वर्ष 2016 का नियम होने के बावजूद पिछले चुनावों में पदाधिकारी चुनाव लड़ते रहे। अब अचानक उसी नियम के आधार पर नामांकन रद्द करना गलत है। यह चयनात्मक कार्रवाई है, जिसे वे अदालत में चुनौती देंगे।
आगे 27 जुलाई पर टिकी सभी की नजरें
अब इस हाई-प्रोफाइल कानूनी विवाद की नजरें 27 जुलाई को देश की शीर्ष अदालत में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि मामला सिर्फ नोटिस तक सीमित रहेगा या डीके जैन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की राह खुलेगी। यह मामला न केवल एक व्यक्ति बल्कि पूरे बार के सिस्टम और न्यायिक गरिमा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश देखें Writ Petition(s)(Criminal) No(s).157/2026
