LAW'S VERDICT

“लाइसेंस खत्म तो केस भी खत्म: सोम डिस्टलरीज को हाईकोर्ट से करारा झटका”

जबलपुर।  मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने शराब निर्माण और विक्रय से जुड़ी देश की सबसे बड़ी कंपनी सोम डिस्टलरीस को बड़ा झटका देते हुए साफ कर दिया कि जब लाइसेंस की अवधि समाप्त हो चुकी हो, तो उससे जुड़ा विवाद स्वतः समाप्त माना जाएगा। अदालत ने Som Distilleries की रिट अपील का निराकरण कर दिया।

यह फैसला जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 31 मार्च 2026 को लाइसेंस की अवधि खत्म हो चुकी है, इसलिए अब इस मामले में सुनवाई का कोई औचित्य नहीं बचता—यानी मामला “इन्फ्रक्टुअस” हो चुका है।

क्या था पूरा मामला?

मामला सोम डिस्टलरीज से जुड़ा था, जिसके कर्मचारियों को भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं—420, 467, 468, 470 और 120-बी—में सजा सुनाई गई थी। इसके बाद आबकारी आयुक्त ने फरवरी 2026 में कंपनी के आठ लाइसेंस निलंबित कर दिए थे।

कंपनी ने अदालत में दलील दी कि कर्मचारियों को आबकारी अधिनियम के तहत दोषी नहीं ठहराया गया, इसलिए लाइसेंस निलंबन गलत है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित सजा के खिलाफ अपील लंबित है और उस पर रोक भी लग चुकी है।

कोर्ट ने क्यों ठुकराई दलील?

हाईकोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि अब लाइसेंस की वैधता ही समाप्त हो चुकी है, इसलिए इस विवाद पर सुनवाई का कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लाइसेंस का नवीनीकरण एक अलग कानूनी प्रक्रिया है, जिसे सक्षम प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से तय करेगा।

122 करोड़ के नुकसान का दावा भी बेअसर

कंपनियों ने यह भी दावा किया कि उन्हें 122 करोड़ रुपये के स्टॉक को बेचने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे भारी आर्थिक नुकसान हुआ और राज्य को भी करीब 79 करोड़ रुपये के राजस्व का घाटा हुआ।

इस पर कोर्ट ने दो टूक कहा कि स्टॉक के निपटान के लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। या तो उसे अन्य लाइसेंसधारी को बेचा जा सकता है या राज्य सरकार निर्धारित दर पर खरीद सकती है। ऐसे में इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।

अदालत ने रिट अपील का निराकरण करते हुए साफ कर दिया कि कानून से बाहर जाकर राहत की उम्मीद नहीं की जा सकती। राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत रूपराह और हस्तक्षेपकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय के अग्रवाल ने पक्ष रखा।

हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि लाइसेंस आधारित व्यवसायों में समयसीमा का कानूनी महत्व सर्वोपरि है—और उसके खत्म होते ही विवाद भी खत्म माना जा सकता है।

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