LAW'S VERDICT

बैलेट बॉक्स खुलते ही खुली गड़बड़ियों की परतें: हाईकोर्ट बोला—रिट नहीं, चुनाव याचिका ही रास्ता

रीवा जिले की सिरमौर बार एसोसिएशन का चुनाव विवाद, हाईकोर्ट में खुला बैलट बॉक्स और हुई वोटों की गिनती भी 

जबलपुर। वकीलों के चुनाव से जुड़े एक अहम विवाद में असाधारण कदम उठाते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बैलेट बॉक्स को अदालत में मंगवाकर खुलवाया और वोटों की दोबारा गिनती कराई। यह मामला रीवा जिले के सिरमौर बार एसोसिएशन के चुनाव से जुड़ा है, जहां उपाध्यक्ष और ग्रंथपाल पद के परिणामों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। सुनवाई के दौरान सामने आई अनियमितताओं ने कोर्ट को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि इस विवाद का समाधान रिट याचिका के जरिए संभव नहीं है—इसके लिए विधिवत चुनाव याचिका दायर करनी होगी।

बैलेट बॉक्स खुला तो सामने आईं चौंकाने वाली गड़बड़ियां

चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ डिवीजन बेंच ने सोमवार को जब बैलेट बॉक्स की स्थिति देखी तो कई गंभीर खामियां उजागर हुईं। बॉक्स की सील टूटी हुई पाई गई और उसमें रखे बैलेट पेपरों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी सामने आई।

सहायक चुनाव अधिकारी राजेश पाण्डेय ने खुद कोर्ट में स्वीकार किया कि बॉक्स को मतदान के बाद विधिवत सील किया गया था, लेकिन पेश किए गए बॉक्स में सील टूटी हुई थी और कागज भी फटा हुआ है। यह सीधे तौर पर प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

कोर्ट ने कराई दोबारा मतगणना, रिपोर्ट में बड़ा अंतर

मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने रजिस्ट्रार आशीष तिवारी को वोटों की गिनती करने के निर्देश दिए। लंच के बाद पेश की गई रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ—चुनाव अधिकारी द्वारा बताए गए आंकड़ों और रजिस्ट्रार की गिनती में अंतर पाया गया। इस अंतर ने पूरे चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

पुनर्मतदान पर भी अटका पेंच

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक विकल्प यह भी रखा कि यदि सभी पक्ष सहमत हों तो नए सिरे से चुनाव कराया जा सकता है। लेकिन यहां भी पेच फंस गया—चार में से तीन उम्मीदवार तो तैयार थे, लेकिन एक उम्मीदवार की अनुपस्थिति के कारण सर्वसम्मति नहीं बन पाई।

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सभी उम्मीदवारों की सहमति के बिना पुनर्मतदान संभव नहीं है।

कोर्ट का साफ संदेश—“रिट नहीं, चुनाव याचिका दायर करें”

याचिका उपाध्यक्ष पद के निर्वाचित प्रत्याशी मणिकामना प्रसाद पाण्डेय और ग्रंथपाल पद के सतीश कुमार मिश्रा की ओर से दायर की गई थी। उनका आरोप था कि 9 मई 2025 को हुए चुनाव में जीत के बावजूद उन्हें पदभार नहीं सौंपा गया। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के विवाद, जिनमें साक्ष्य और तथ्यों की विस्तृत जांच जरूरी हो, उन्हें रिट याचिका के तहत नहीं सुलझाया जा सकता। इसके लिए उचित मंच चुनाव याचिका है, जहां विस्तार से साक्ष्यों की जांच हो सके।

क्या है इस फैसले का बड़ा संदेश?

यह मामला सिर्फ एक बार एसोसिएशन चुनाव का नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता और प्रक्रिया की विश्वसनीयता का भी है। हाईकोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि-

- चुनावी विवादों में तकनीकी और तथ्यात्मक जांच जरूरी है।

- रिट याचिका हर विवाद का समाधान नहीं है। 

- उचित मंच और प्रक्रिया का पालन ही न्याय सुनिश्चित कर सकता है।


हाईकोर्ट की इस कार्रवाई ने साफ कर दिया कि चुनाव से जुड़े गंभीर विवादों में जल्दबाजी में फैसला नहीं, बल्कि विधिसम्मत प्रक्रिया ही अंतिम रास्ता है। अब सभी की नजर इस पर टिकी है कि याचिकाकर्ता चुनाव याचिका दायर करते हैं या नहीं—और आगे यह मामला किस दिशा में जाता है।

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