कनाडा कोर्ट के फैसले को दरकिनार कर हाईकोर्ट ने बच्ची को भारत में ही रखा, पिता की याचिका खारिज
इंदौर। नाबालिग बच्ची की कस्टडी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे विवाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि बच्चे के सर्वोत्तम हित (वेलफेयर) से बढ़कर कुछ नहीं है-यहां तक कि विदेशी अदालत का आदेश भी नहीं। कनाडा की अदालत द्वारा पिता को कस्टडी दिए जाने के बावजूद हाईकोर्ट ने बच्ची को भारत में उसकी मां के पास ही रहने दिया और पिता की याचिका खारिज कर दी। अपने फैसले में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी की डिवीज़न बेंच ने रामायण और महाभारत के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि भारतीय परंपरा में मां को बच्चे का पहला संरक्षक माना गया है। “मातृदेवो भव” और “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” जैसे सिद्धांतों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि मातृत्व केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक आधार भी है।
यह मामला एक ऐसी बच्ची ‘मिराया’ की कस्टडी से जुड़ा है, जिसका जन्म अमेरिका में हुआ, परवरिश कनाडा में हुई और बीते चार साल से वह भारत में अपनी मां के साथ रह रही है। पिता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर मांग की थी कि बच्ची की कस्टडी उन्हें सौंपी जाए और उसे कनाडा भेजा जाए, क्योंकि वहां की Superior Court of Justice, Ontario ने उन्हें एकल अभिरक्षा (sole custody) प्रदान की है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता और प्रतिवादी (मां) की शादी वर्ष 2014 में मुंबई के लोनावला में हुई थी। शादी के बाद दोनों अमेरिका और फिर कनाडा में बस गए। वर्ष 2016 में उनकी बेटी मिराया का जन्म शिकागो में हुआ, जिससे उसे अमेरिकी नागरिकता मिली। बाद में परिवार कनाडा में स्थायी रूप से रहने लगा और बच्ची वहां स्कूल भी जाने लगी।
कोविड-19 महामारी के दौरान वर्ष 2019 में बच्ची अपनी मां के साथ भारत आई और यहीं रुक गई। वर्ष 2022 में जब मां ने कनाडा लौटने से इनकार कर दिया, तब विवाद बढ़ा और पिता ने कनाडा की अदालत में मामला दायर किया। कनाडाई अदालत ने न सिर्फ बच्ची को वापस लाने का आदेश दिया बल्कि मार्च 2024 में पिता को उसकी स्थायी कस्टडी भी सौंप दी।
भारत में कानूनी लड़ाई
पिता ने पहले भी हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने Supreme Court of India का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए याचिकाकर्ता को राहत दी कि चूंकि कनाडा की अदालत का नया आदेश आया है, इसलिए वह भारत में पुनः उचित मंच पर याचिका दायर कर सकते हैं। इसी के तहत यह नई याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी।
हाईकोर्ट के सामने क्या थे सवाल?
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने तीन अहम प्रश्नों पर विचार किया:
- क्या विदेशी अदालत के आदेश को सीधे लागू करना जरूरी है?
- क्या मां द्वारा बच्ची को भारत में रखना अवैध है?
- बच्चे के सर्वोत्तम हित में क्या जरूरी है?
अदालत ने अपनी माँ के पास सुरक्षित है मिराया
हाईकोर्ट ने बच्ची मिराया को अपने समक्ष पेश कराया और उससे बातचीत भी की। अदालत ने पाया कि:
- बच्ची पिछले चार वर्षों से भारत में रह रही है
- वह एक अच्छे स्कूल में पढ़ रही है
- उसका मानसिक और भावनात्मक विकास संतुलित है
- वह अपनी मां के साथ सुरक्षित और सहज महसूस करती है
अदालत ने यह भी माना कि बच्ची की उम्र ऐसी है जहां उसे मातृत्व की विशेष आवश्यकता है।
विदेशी आदेश क्यों नहीं माना गया?
अपने फैसले में जस्टिस शुक्ला ने स्पष्ट किया कि विदेशी अदालतों के आदेशों का सम्मान (comity of courts) किया जाता है, लेकिन वे बाध्यकारी (binding) नहीं होते। भारतीय अदालतें अपने विवेक से, विशेषकर बच्चों के मामलों में, स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए अधिकृत हैं। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि कनाडा की अदालत ने कस्टडी पिता को दी है, बच्ची को जबरन वहां भेजना उसके हित में नहीं होगा।
अंतिम फैसला: माँ के पास ही रहेगी मिराया
सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बच्ची का वर्तमान परिवेश उसके लिए सुरक्षित और अनुकूल है। उसे अचानक कनाडा भेजना उसके मानसिक और भावनात्मक हित के खिलाफ होगा। इसी आधार पर अदालत ने पिता की याचिका खारिज कर दी।
क्या यह अंतिम कस्टडी फैसला है?
नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल वर्तमान परिस्थितियों और बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। स्थायी कस्टडी का मुद्दा अभी भी सक्षम अदालत में तय किया जा सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय एक अहम कानूनी सिद्धांत को दोहराता है कि “बच्चे का हित सर्वोपरि है, न कि माता-पिता के अधिकार या विदेशी अदालत का आदेश।” यह मामला अंतरराष्ट्रीय कस्टडी विवादों में भारतीय न्यायपालिका के दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है और बताता है कि भारतीय अदालतें मानवीय पहलुओं को सर्वोच्च प्राथमिकता देती हैं।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-22416-2024
