LAW'S VERDICT

यूनियन बैंक की मनमानी पर हाईकोर्ट सख्त: 50 हजार का जुर्माना ठोका

8 साल से नौकरी के लिए भटक रहे युवक को राहत, अनुकम्पा नियुक्ति पर विचार करने के आदेश 

जबलपुर।  मप्र हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने बैंक द्वारा युवक की नौकरी की मांग ठुकराने वाले आदेश को रद्द कर दिया और दो महीने में नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है। साथ ही बैंक पर ₹50,000 के जुर्माना भी लगाया है।

क्या है पूरा मामला

रीवा में रहने वाले निखिल कोल ने यह याचिका दायर करके 30 जनवरी 2018 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें बैंक ने अनुकंपा नियुक्ति देने से इंकार कर दिया था। युवक ने बैंक में चपरासी/मैसेंजर पद पर नियुक्ति की मांग की थी। याचिकाकर्ता के पिता स्वर्गीय शंकर प्रसाद कोल बैंक में नियमित कर्मचारी थे और रीवा जिले की सगरा शाखा में दफ्तरी पद पर कार्यरत थे। उन्होंने 22 वर्ष 4 माह तक सेवा दी। 7 अगस्त 2016 को सेवा के दौरान अचानक हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया।

परिवार पर टूटा संकट

पिता की मौत के बाद परिवार पूरी तरह आर्थिक संकट में आ गया। याचिकाकर्ता की मां का निधन पहले ही 2012 में हो चुका था। युवक परिवार का इकलौता बेटा है। उस पर पत्नी, एक छोटे बेटे और तीन अविवाहित बहनों की जिम्मेदारी आ गई, जो पढ़ाई कर रही थीं। इसी परिस्थिति में युवक ने बैंक की अनुकंपा नियुक्ति योजना के तहत आवेदन किया था। स्थानीय अधिकारियों ने आवेदन की अनुशंसा कर आगे भेजा, लेकिन बाद में बैंक ने “मृत कर्मचारी का सेवा रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं था” कहकर आवेदन खारिज कर दिया।

नीति से बाहर जाकर निर्णय लिया: हाईकोर्ट 

हाईकोर्ट ने कहा कि बैंक की अनुकंपा नियुक्ति नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें मृत कर्मचारी के कथित असंतोषजनक सेवा रिकॉर्ड के आधार पर आश्रित की नौकरी रोकी जा सके। अदालत ने कहा कि बैंक ने अपनी ही नीति से बाहर जाकर मनमाने तरीके से निर्णय लिया। यह आदेश गैरकानूनी, मनमाना और प्रशासनिक कानून के सिद्धांतों के विपरीत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि परिवार पहले से आर्थिक संकट में था, फिर भी बैंक ने वर्षों तक मामला लंबित रखा और बाद में अस्पष्ट कारण देकर खारिज कर दिया।

अनुकम्पा पर फिर से विचार करने के आदेश 

हाईकोर्ट ने बैंक का 30 जनवरी 2018 का आदेश निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के आवेदन पर 60 दिन में दोबारा विचार किया जाए। निर्णय नीति के अनुसार और पुराने अवैध कारणों से प्रभावित न हो। यदि याचिकाकर्ता पात्र पाया जाए तो नियुक्ति भविष्यकालीन (prospective) प्रभाव से दी जाए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एनपी चौधरी ने दलीलें रखीं।

₹50 हजार जुर्माना क्यों लगाया?

कोर्ट ने कहा कि बैंक ने न केवल देरी की बल्कि अदालत में जवाब तक दाखिल नहीं किया। इस कारण गरीब याचिकाकर्ता को 2016 से लगातार आर्थिक कष्ट झेलना पड़ा। इसलिए बैंक पर ₹50,000 की लागत लगाई गई, जो डिमांड ड्राफ्ट से 30 दिन में याचिकाकर्ता को देना होगा। 

अदालत ने बैंक अधिकारियों को चेतावनी दी कि भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति जैसे कल्याणकारी मामलों में बिना कारण, अपारदर्शी या नीति से बाहर जाकर आदेश पारित किए गए तो अदालत गंभीर दृष्टि से देखेगी।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  WP 794/2019

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