LAW'S VERDICT

सोम डिस्टलरीज लाइसेंस निलंबन मामला: सुको ने कहा- मप्र सरकार 18 तक दाखिल करे जवाब, 20 मार्च को हाईकोर्ट करे अंतरिम राहत पर विचार

जबलपुर। आबकारी वर्ष 2025-26 के लिए लाइसेंस निलंबन से जुड़े सोम डिस्टलरीज मामले में सोमवार को महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। इस मामले में एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, वहीं दूसरी ओर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर में भी याचिका पर विचार हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में 18 मार्च 2026 तक अपना जवाब दाखिल करे, जिसके बाद 20 मार्च को हाईकोर्ट अंतरिम राहत के मुद्दे पर विचार करेगा।

यह मामला प्रदेश के आबकारी विभाग द्वारा जारी उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें 4 फरवरी 2026 को सोम डिस्टलरीज प्राइवेट लिमिटेड और सोम डिस्टलरीज एंड ब्रेवरीज प्राइवेट लिमिटेड के लाइसेंस निलंबित कर दिए गए थे। कंपनियों ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

लाइसेंस निलंबन को दी गई चुनौती

याचिकाकर्ता कंपनियों का आरोप है कि आबकारी आयुक्त द्वारा जारी किया गया निलंबन आदेश बिना उचित सुनवाई के जारी किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। कंपनियों का कहना है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना ही लाइसेंस निलंबित कर दिए गए, जिससे उनके व्यवसाय पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आबकारी आयुक्त द्वारा की गई कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इसे कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कंपनियों ने अदालत से आदेश को निरस्त करने और अंतरिम राहत देने की मांग की है।

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच से नहीं मिली राहत

इस मामले में इससे पहले जस्टिस विशाल मिश्रा और जस्टिस एसएन भट्ट सुनवाई से इंकार कर चुके थे। 5 मार्च 2026 को इस मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल की सिंगल बेंच में हुई थी। उस समय अदालत ने कंपनियों को अंतरिम राहत देने से इंकार कर दिया था। सिंगल बेंच के इस फैसले के खिलाफ सोम डिस्टलरीज की ओर से हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील दायर की गई थी, जिसमें लाइसेंस निलंबन आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा मामला

इसी बीच कंपनियों ने इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी दाखिल कर दी। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्यप्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह 18 मार्च तक अपना जवाब दाखिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार का जवाब आने के बाद 20 मार्च को हाईकोर्ट अंतरिम राहत के मुद्दे पर विचार कर सकता है। इस आदेश के बाद मामले की आगे की सुनवाई का रास्ता साफ हो गया है।

एक ही मुद्दे पर अलग-अलग अदालतों में सुनवाई 

सोमवार को जब यह मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर में चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच के सामने आया, तब अदालत ने इस पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने कहा कि एक ही मुद्दे से संबंधित मामले अलग-अलग अदालतों में लंबित हों तो समानांतर सुनवाई उचित नहीं मानी जाती। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में किसी एक मंच पर ही सुनवाई होना बेहतर होता है।

अपील वापस लेने की अनुमति

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सोम डिस्टलरीज की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ और अधिवक्ता राहुल दिवाकर ने अदालत को बताया कि इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है और वहां से राज्य सरकार तथा हाईकोर्ट को निर्देश भी दिए गए हैं। इस स्थिति को देखते हुए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से अपनी अपील वापस लेने की अनुमति मांगी। डिवीजन बेंच ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपील वापस लेने की अनुमति दे दी और उसके बाद अपील को खारिज कर दिया।

20 मार्च को होगी महत्वपूर्ण सुनवाई

अब इस पूरे मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण 20 मार्च 2026 को आएगा, जब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में अंतरिम राहत के मुद्दे पर विचार किया जाएगा। उससे पहले राज्य सरकार को 18 मार्च तक अपना जवाब दाखिल करना होगा।कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के जवाब और अदालत की आगे की सुनवाई के आधार पर यह तय होगा कि लाइसेंस निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगती है या नहीं।

उद्योग जगत की नजरें मामले पर

सोम डिस्टलरीज से जुड़ा यह मामला प्रदेश के आबकारी और शराब उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लाइसेंस निलंबन और उसके खिलाफ कानूनी चुनौती का प्रभाव न केवल संबंधित कंपनियों बल्कि पूरे उद्योग पर पड़ सकता है। इसी कारण व्यापार जगत, आबकारी विभाग और कानूनी विशेषज्ञों की नजरें इस मामले की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई हैं। यदि हाईकोर्ट अंतरिम राहत देता है तो याचिकाकर्ता कंपनियों को अस्थायी राहत मिल सकती है, जबकि राहत न मिलने की स्थिति में उन्हें आगे कानूनी विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post