ललितपुर-सिंगरौली (खजुराहो) रेल लाइन परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रेलवे की ललितपुर-सिंगरौली (खजुराहो) रेल लाइन परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के बदले नौकरी की मांग करने वाले 6 याचिकाकर्ताओं को राहत देने से इंकार कर दिया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि जब आवेदकों के पास आवेदन के समय आवश्यक शैक्षणिक योग्यता ही नहीं थी, तब वे नियुक्ति का दावा नहीं कर सकते। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), जबलपुर बेंच के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं खारिज कर दीं।
यह मामला उन व्यक्तियों (राकेश कुशवाहा व अन्य) से जुड़ा है जिनकी जमीन रेलवे परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी। जमीन जाने के बाद उन्होंने भारतीय रेलवे में नियुक्ति देने की मांग करते हुए पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का रुख किया था। हालांकि, अधिकरण ने 1 मई 2025 को पारित अपने आदेश में उनकी मूल आवेदनों (Original Applications) को खारिज कर दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में मिसलेनियस पिटीशन्स दायर की थीं।
जमीन अधिग्रहण के बदले नौकरी की मांग
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि रेलवे की नीति के तहत जिन लोगों की जमीन रेलवे परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की जाती है, उन्हें रोजगार सहायता के रूप में रेलवे में नौकरी देने का प्रावधान है। उन्होंने अदालत को बताया कि इसी योजना के तहत कई अन्य प्रभावित लोगों को पहले ही नियुक्ति मिल चुकी है।
इसी आधार पर याचिकाकर्ताओं ने अधिकरण और हाईकोर्ट से अनुरोध किया था कि रेलवे अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे उनकी नियुक्ति के दावे पर विचार करें और उन्हें रेलवे में नौकरी प्रदान करें।
10वीं पास न होने पर खारिज हुए थे आवेदन
मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि याचिकाकर्ताओं के आवेदन मुख्य रूप से इसलिए खारिज किए गए क्योंकि आवेदन करते समय उनके पास न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता यानी 10वीं कक्षा उत्तीर्ण नहीं थी। रेलवे की संबंधित नीति और 14 अक्टूबर 2016 की अधिसूचना के अनुसार, ग्रुप ‘डी’ पदों पर नियुक्ति के लिए कम से कम 10वीं पास, आईटीआई या समकक्ष योग्यता आवश्यक थी। लेकिन रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने अपने प्रारंभिक आवेदन में अपनी शैक्षणिक योग्यता आठवीं कक्षा पास बताई थी। इस कारण वे निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते थे और उनके आवेदन खारिज कर दिए गए।
बाद में 10वीं पास करने का दिया गया तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि उन्होंने बाद में 10वीं की परीक्षा पास कर ली और उसके बाद अपनी मार्कशीट के साथ दोबारा आवेदन प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि रेलवे अधिकारियों को इस बाद के विकास को ध्यान में रखते हुए उनके दावे पर विचार करना चाहिए था। हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पात्रता का आकलन आवेदन के समय की स्थिति के आधार पर किया जाता है, न कि बाद में प्राप्त की गई योग्यता के आधार पर।
पहले खारिज आदेश को समय पर चुनौती नहीं
अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जब याचिकाकर्ताओं के पहले आवेदन को शैक्षणिक योग्यता की कमी के आधार पर खारिज किया गया था, तब उन्होंने उस आदेश को समय रहते चुनौती नहीं दी। नतीजतन वह आदेश अंतिम हो गया। बाद में जब उन्होंने नई योग्यता के आधार पर फिर से आवेदन किया और वह भी खारिज हो गया, तब उन्होंने इस मुद्दे को अदालत में उठाया। कोर्ट ने कहा कि इतनी देर से उठाया गया यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता।
प्राधिकरण की क्षमता पर सवाल भी खारिज
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि उनके आवेदन को खारिज करने की प्रक्रिया में भूमि अधिग्रहण अधिकारी और रेलवे के उप मुख्य अभियंता की रिपोर्ट पर आधारित निर्णय लिया गया, जो उनके अनुसार सक्षम प्राधिकारी नहीं थे। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ताओं के आवेदन सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रखे गए थे और संबंधित नीति के अनुसार विचार के बाद ही उन्हें खारिज किया गया था।
अन्य मामलों का हवाला भी अस्वीकार
याचिकाकर्ताओं की ओर से एक अन्य मामले “चरण प्रकाश कुशवाहा बनाम भारत संघ” में अधिकरण द्वारा दिए गए आदेश का हवाला दिया गया था। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि वह आदेश इस मामले पर बाध्यकारी नहीं है और उस निर्णय में नीति के प्रावधानों की सही व्याख्या नहीं की गई थी। इसलिए उसे इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता।
भेदभाव के आरोप भी खारिज
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कई अन्य मामलों में रेलवे ने शैक्षणिक योग्यता में ढील देते हुए नियुक्तियां दी हैं, जबकि उनके मामले में ऐसा नहीं किया गया। अदालत ने इस तर्क को भी अस्वीकार करते हुए कहा कि नियुक्ति देना एक विवेकाधीन निर्णय होता है, जो प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर लिया जाता है। इसलिए इसे भेदभाव नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने पाया आदेश सही
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा के अधिकार का उपयोग करते हुए अदालत को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के आदेश में कोई अवैधता, त्रुटि या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती दिखाई नहीं देती। अधिकरण ने उपलब्ध तथ्यों, नियमों और रेलवे की नीति के आधार पर ही अपना निर्णय दिया है।
सभी 6 याचिकाएं हुईं खारिज
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे हैं कि उन्हें रेलवे में नियुक्ति पाने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त है। अदालत ने कहा कि जब आवेदन के समय वे आवश्यक पात्रता शर्तों को पूरा ही नहीं करते थे और बाद में संबंधित नीति भी वापस ले ली गई, तो नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी के साथ हाईकोर्ट ने कहा कि मिसलेनियस पिटीशन्स में कोई मेरिट नहीं है, इसलिए उन्हें खारिज किया जाता है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें MISC. PETITION No. 3917 of 2025
