जबलपुर। हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें किराएदारों ने रेंट एग्रीमेंट के आधार पर मकान किराए पर लिया और उसी एग्रीमेंट का उपयोग कर एक फर्म बनाकर बैंक से लोन ले लिया। लोन लेने के बाद किराएदार तो गायब हो जाता है, लेकिन वसूली का नोटिस मकान मालिक के नाम पर पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि रेंट एग्रीमेंट बनाते समय किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरती जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, एग्रीमेंट में साफ तौर पर यह उल्लेख होना चाहिए कि यदि किराएदार इस अनुबंध के आधार पर कोई फर्म बनाकर बैंक से लोन लेता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी किराएदार की ही होगी। इस एक शर्त को शामिल करने से मकान मालिक संभावित धोखाधड़ी या कानूनी कार्रवाई से काफी हद तक सुरक्षित रह सकते हैं।
विवाद होने पर बनता है सुरक्षा कवच
अक्सर लोग मकान या दुकान किराए पर लेने-देने के दौरान मौखिक सहमति पर ही भरोसा कर लेते हैं। लेकिन जब किसी कारण विवाद की स्थिति बनती है, तब उनके पास कोई लिखित प्रमाण नहीं होता। रेंट एग्रीमेंट यानी किरायानामा दोनों पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करता है और कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। यह सिर्फ एक औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि ऐसा कानूनी प्रमाण है जो जरूरत पड़ने पर मकान मालिक और किराएदार दोनों के अधिकारों की रक्षा करता है।
