LAW'S VERDICT

अहम दस्तावेज है रेंट एग्रीमेंट, न बरतें कोई भी लापरवाही

 जबलपुर। हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें किराएदारों ने रेंट एग्रीमेंट के आधार पर मकान किराए पर लिया और उसी एग्रीमेंट का उपयोग कर एक फर्म बनाकर बैंक से लोन ले लिया। लोन लेने के बाद किराएदार तो गायब हो जाता है, लेकिन वसूली का नोटिस मकान मालिक के नाम पर पहुंच जाता है। ऐसी स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि रेंट एग्रीमेंट बनाते समय किसी भी प्रकार की लापरवाही न बरती जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, एग्रीमेंट में साफ तौर पर यह उल्लेख होना चाहिए कि यदि किराएदार इस अनुबंध के आधार पर कोई फर्म बनाकर बैंक से लोन लेता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी किराएदार की ही होगी। इस एक शर्त को शामिल करने से मकान मालिक संभावित धोखाधड़ी या कानूनी कार्रवाई से काफी हद तक सुरक्षित रह सकते हैं।

विवाद होने पर बनता है सुरक्षा कवच

अक्सर लोग मकान या दुकान किराए पर लेने-देने के दौरान मौखिक सहमति पर ही भरोसा कर लेते हैं। लेकिन जब किसी कारण विवाद की स्थिति बनती है, तब उनके पास कोई लिखित प्रमाण नहीं होता। रेंट एग्रीमेंट यानी किरायानामा दोनों पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करता है और कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। यह सिर्फ एक औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि ऐसा कानूनी प्रमाण है जो जरूरत पड़ने पर मकान मालिक और किराएदार दोनों के अधिकारों की रक्षा करता है।

क्यों जरूरी है रेंट एग्रीमेंट

- मकान मालिक और किराएदार के बीच लिखित अनुबंध होने से विवाद की संभावना कम हो जाती है।
- बिजली-पानी के बिल, रखरखाव, मरम्मत और किराया बढ़ाने की शर्तें स्पष्ट हो जाती हैं।
- अदालत में यह दस्तावेज मान्य होता है और दोनों पक्षों को कानूनी सुरक्षा देता है।

ध्यान रखने योग्य बातें

- रेंट एग्रीमेंट हमेशा लिखित रूप में होना चाहिए।
- इसे स्टाम्प पेपर पर बनाकर पंजीकृत कराना बेहतर माना जाता है।
- अनुबंध में किराया, जमा राशि, अवधि, नोटिस पीरियड और अन्य शर्तें स्पष्ट लिखी हों।
- एग्रीमेंट पर दोनों पक्षों के साथ दो स्वतंत्र गवाहों के हस्ताक्षर होना जरूरी है।

याद रखें — अपने अधिकारों की जानकारी ही सबसे बड़ी ताकत है।

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