इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है, जिसमे उज्जैन के विक्रम विश्विद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पदस्थ डॉ. रामजी यादव को Qwo-Wrranto के तहत हटाने के निर्देश दिए जाने की राहत चाही गई थी। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की बेंच ने कहा कि विश्वविद्यालय के लेक्चरर या एसोसिएट प्रोफेसर का पद “पब्लिक पोस्ट” नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
1996 में हुई नियुक्ति को दी थी चुनौती
विक्रम विश्वविद्यालय के ही डॉ. क्षमाशील मिश्रा ने यह याचिका दायर करके विश्वविद्यालय द्वारा 14 फरवरी 1996 को जारी नियुक्ति आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत डॉ. रामजी यादव को कंप्यूटर साइंस एंड एप्लीकेशन के लेक्चरर पद पर नियुक्त किया गया था, जो कि OBC (नॉन-क्रीमी लेयर) वर्ग के लिए आरक्षित था।
कोर्ट ने की पब्लिक ऑफिस की व्याख्या
हाईकोर्ट ने सबसे पहले इस बात पर विचार किया कि क्या यह पद “पब्लिक ऑफिस” की श्रेणी में आता है या नहीं। अदालत ने कहा कि विश्वविद्यालय के शिक्षक केवल कर्मचारी (employee) होते हैं, न कि संवैधानिक या वैधानिक पदाधिकारी। ये जनता के अधिकारों पर सीधा प्रभाव नहीं डालते। इनके पास कोई सार्वजनिक या संप्रभु (sovereign) कार्य नहीं होता। Madhya Pradesh Vishwavidyalaya Adhiniyam, 1973 में शिक्षक को “Officer” या “Authority” नहीं माना गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“लेक्चरर या एसोसिएट प्रोफेसर का पद पब्लिक ऑफिस नहीं है, इसलिए क्वो वारंटो याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं है।”
बिना मेरिट देखे खारिज हुई याचिका
चूंकि याचिका maintainable ही नहीं थी, इसलिए अदालत ने डॉ. यादव की योग्यता, डिग्री या चयन प्रक्रिया से जुड़े अन्य आरोपों पर विचार नहीं किया और सीधे याचिका को प्रारंभिक स्तर (threshold) पर ही खारिज कर दिया।
क्या है Quo Warranto?
Quo Warranto एक संवैधानिक उपाय है, जिसके जरिए अदालत यह जांचती है कि कोई व्यक्ति किसी “पब्लिक ऑफिस” पर वैध रूप से बैठा है या नहीं। लेकिन इस केस में सबसे जरूरी शर्त पब्लिक ऑफिस होना ही साबित नहीं हुआ।
हाईकोर्ट का आदेश देखें W.P. No. 5927/2024
