रीवा जिले के 28 शिक्षकों ने 2018 के नियमों को बताया असंवैधानिक, सरकार व अन्य को हाईकोर्ट का नोटिस
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में मध्यप्रदेश के रीवा जिले के 28 शिक्षकों ने एक अहम याचिका दायर कर मप्र स्कूल शिक्षा सेवा (टीचिंग कैडर) सेवा शर्त एवं भर्ती नियम, 2018 को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन नियमों और 27 जुलाई 2019 को जारी कार्यपालिक निर्देशों के कारण उन्हें उनके वर्षों पुराने अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। मंगलवार को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीज़न बेंच ने मामले पर राज्य सरकार सहित 7 को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिए। जवाब पेश करने बेंच ने अनावेदकों को 4 सप्ताह का समय दिया है। यह मामला प्रदेश के हजारों शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसका असर सेवा शर्तों, पेंशन और वरिष्ठता से जुड़े व्यापक वर्ग पर पड़ सकता है।
वर्ष 1998 से कर रहे हैं काम, अब नए कर्मचारी मान रहे
रीवा जिले के प्राथमिक शिक्षक पंकज पांडेय व 27 अन्य की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि वे सभी वर्ष 1998-99 से स्कूल शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं और लंबे समय तक शिक्षा कर्मी एवं अध्यापक के रूप में सेवा दे चुके हैं। इसके बावजूद 2018 के नए नियम लागू कर उन्हें “फ्रेश एंट्री” यानी नए कर्मचारी की तरह माना जा रहा है। इससे उनकी सीनियरिटी समाप्त हो गई है और उन्हें नई सेवा शर्तों के तहत शामिल कर दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि नियम 18(1) और 18(2) के तहत उनसे एक बाध्यकारी अंडरटेकिंग भरवाई गई, जिसके जरिए नई शर्तों को स्वीकार कराया गया। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया दबाव में कराई गई और कई शिक्षकों ने मजबूरी में इसे स्वीकार किया। कुछ शिक्षक अब भी अध्यापक संवर्ग में कार्यरत हैं, जिन्हें भी समान रूप से लाभ मिलना चाहिए।
नए नियमों से अधिकारों से वंचित हो रहे
शिक्षकों का मुख्य तर्क है कि उन्हें पुरानी पेंशन योजना यानी M.P. Civil Services Pension Rules, 1976 के तहत लाभ मिलना चाहिए, क्योंकि उनकी सेवा 1998 से लगातार जारी है। लेकिन 2018 के नियमों के कारण उन्हें इस अधिकार से वंचित कर दिया गया है। साथ ही, वर्षों की सेवा से अर्जित वरिष्ठता और अन्य लाभ भी खत्म कर दिए गए हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि इतने लंबे समय तक सेवा देने के बाद किसी कर्मचारी को अचानक “नया कर्मचारी” मानना पूरी तरह मनमाना और अन्यायपूर्ण है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, जो समानता और समान अवसर के अधिकार की गारंटी देते हैं। इसके अलावा, 1998 की भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का हवाला देते हुए कहा गया है कि कुछ शिक्षकों का नियमितीकरण नहीं हो पाया, जबकि उन्हें भी समान शर्तों पर शामिल किया जाना चाहिए था। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की है कि 2018 के नियमों और 2019 के कार्यपालिक निर्देशों को असंवैधानिक घोषित किया जाए और उन्हें पुरानी पेंशन योजना के तहत सभी लाभ तथा सीनियरिटी बहाल की जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विवेक बड़ेरिया पैरवी कर रहे हैं।
