LAW'S VERDICT

20 साल की नौकरी के बावजूद गेस्ट फैकल्टी को नहीं मिल सकता स्थायी दर्जा

नियमितीकरण की मांग को लेकर 291 गेस्ट फैकल्टी की याचिका  मप्र हाईकोर्ट से खारिज 

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गेस्ट फैकल्टी (Guest Faculty) के नियमितीकरण को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर फैसला सुनाते हुए 291 संविदा सहायक प्राध्यापकों, स्पोर्ट्स ऑफिसर्स और लाइब्रेरियनों को बड़ा झटका दिया है। जस्टिस विशाल धगट की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया है कि केवल लंबे समय तक सेवा देने से किसी भी कर्मचारी को नियमित नियुक्ति (Regularization) का अधिकार नहीं मिल जाता।

इस याचिका में याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उन्हें उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से स्थायी किया जाए, सभी सेवा लाभ दिए जाएं, “फॉलन आउट” घोषित कर्मचारियों को पुनः नियुक्त किया जाए और राज्य सरकार द्वारा जारी नई भर्ती विज्ञापन को निरस्त किया जाए। हाईकोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी नौकरी में स्थायी नियुक्ति केवल नियमों और वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही संभव है। लंबे समय तक संविदा या गेस्ट फैकल्टी के रूप में काम करने से स्वतः नियमितीकरण का अधिकार नहीं बनता।

20 साल से कर रहे थे सेवा, फिर भी नहीं मिला अधिकार

पन्ना जिले के डॉक्टर कमल प्रताप सिंह व 290 अन्य की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया था कि वे पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से मध्यप्रदेश के विभिन्न शासकीय कॉलेजों में कार्यरत हैं। वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के सभी आवश्यक मानकों को पूरा करते हैं और नियमित शिक्षकों की तरह ही पढ़ाई, परीक्षा, मूल्यांकन और प्रशासनिक कार्य करते हैं। इसके बावजूद उन्हें मात्र ₹50,000 प्रतिमाह का निश्चित मानदेय दिया जा रहा है, जिसमें कोई महंगाई भत्ता, वेतन वृद्धि या अन्य सेवा लाभ शामिल नहीं है। हर साल 89 दिन का अनुबंध बनाकर सेवा समाप्त कर दी जाती है और फिर नई चयन प्रक्रिया के माध्यम से दोबारा नियुक्ति की जाती है।

नियमों के खिलाफ नियमितीकरण संभव नहीं: सरकार 

वहीं, राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली की दलील थी कि सरकार पहले ही अतिथि शिक्षकों को कई महत्वपूर्ण राहत और अवसर दे चुकी है, लेकिन नियमों के विरुद्ध किसी भी प्रकार का नियमितीकरण न तो संभव है और न ही संवैधानिक। उन्होंने कहा कि गेस्ट फैकल्टी को अधिकतम आयु सीमा में छूट (Age Relaxation) दी गई है, ताकि वे नियमित भर्ती प्रक्रिया में आसानी से भाग ले सकें। इसके अलावा, उनके अनुभव को मान्यता देते हुए प्रति वर्ष 4 अंक का अतिरिक्त वेटेज दिया जाता है, जो अधिकतम 20 अंकों तक सीमित है। यह प्रावधान विशेष रूप से इसलिए किया गया है ताकि लंबे समय से कार्यरत गेस्ट फैकल्टी को प्रतिस्पर्धा में लाभ मिल सके। इसके अलावा राज्य सरकार ने गेस्ट फैकल्टी के हितों को ध्यान में रखते हुए 25 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) भी प्रदान किया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे नियमित भर्ती में गेस्ट फैकल्टी की भागीदारी और चयन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। सरकार की ओर से यह भी बताया कि वर्ष 2017, 2022 और 2024 में जारी विज्ञापनों में इन सभी लाभों—जैसे आयु में छूट और अनुभव के आधार पर वेटेज—को शामिल किया गया था, जिससे चयन प्रक्रिया अधिक न्यायसंगत और पारदर्शी बन सके।

नियमों के अनुसार ही होगी भर्ती

उप महाधिवक्ता श्री गांगुली ने कोर्ट को बताया कि कॉलेजों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति एक विधिवत गठित आयोग (Properly Constituted Commission) के माध्यम से की जाती है। यह प्रक्रिया नियमों के अनुसार होती है और इससे चयन में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी भी प्रकार की नियुक्ति नियमों के विपरीत की जाती है, तो वह मनमानी (Arbitrary) मानी जाएगी और संविधान के विरुद्ध होगी। इसलिए कोर्ट से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी वैकल्पिक चयन प्रक्रिया को लागू करने का निर्देश दे, क्योंकि ऐसा करना असंवैधानिक और अवैध होगा।

कोर्ट ने क्यों ठुकराई नियमितीकरण की मांग

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गेस्ट फैकल्टी की नियुक्ति नियमित भर्ती नियमों (Recruitment Rules) के अनुसार नहीं हुई थी। शुरुआत से ही यह स्पष्ट था कि उनकी नियुक्ति केवल एक शैक्षणिक सत्र (Academic Session) के लिए अस्थायी रूप से की गई है। कोर्ट ने यह भी कहा कि गेस्ट फैकल्टी और नियमित सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया, चयन मानदंड, आरक्षण और आयु सीमा में काफी अंतर होता है, इसलिए दोनों को समान नहीं माना जा सकता।

“Fallen Out” नियम को बताया वैध

न्यायालय ने “फॉलन आउट” (Fallen Out) नियम को भी पूरी तरह वैध ठहराया। कोर्ट ने कहा- यदि किसी पद पर नियमित भर्ती की जाती है, तो उस पद पर कार्यरत गेस्ट फैकल्टी को हटाना कानूनन सही है। यह अस्थायी कर्मचारियों को हटाकर दूसरे अस्थायी कर्मचारियों को रखने का मामला नहीं है, बल्कि नियमित नियुक्ति से पद भरने का मामला है, जो पूरी तरह संवैधानिक है।

उमा देवी का जजमेंट लागू नहीं

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध “Umadevi Case” का हवाला दिया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे इस मामले में लागू नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि उच्च शिक्षा के पदों को दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों से तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि यहां चयन प्रक्रिया और योग्यता का स्तर अलग होता है।

नई भर्ती पर भी नहीं मिली राहत

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा जारी नियमित सहायक प्राध्यापक भर्ती विज्ञापन पूरी तरह वैध है। गेस्ट फैकल्टी केवल इस आधार पर भर्ती प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते कि वे लंबे समय से कार्यरत हैं।

हाईकोर्ट का फैसला देखें    WP-40861-2025

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