मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ले. कर्नल के खिलाफ भोपाल में दर्ज हुई एफआईआर रद्द की
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि 13 साल तक चले प्रेम संबंध को बाद में बलात्कार नहीं बताया जा सकता, यदि वह संबंध दोनों वयस्कों की सहमति से बना हो। अदालत ने इस मामले में दर्ज एफआईआर, चार्जशीट और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस विनय सराफ की एकलपीठ ने कहा कि यह मामला जबरन बनाए गए संबंध या शादी के झूठे वादे से प्राप्त सहमति का नहीं, बल्कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले आपसी सहमति के रिश्ते का है।
महिला पुलिस कर्मी ने दर्ज कराई थी शिकायत
भोपाल की एक महिला पुलिस कर्मी ने भारतीय सेना में ले. कर्नल के पद पर पदस्थ वरुण के खिलाफ महिला थाना भोपाल में एफआईआर दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि आरोपी ने खुद को अविवाहित बताते हुए शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला के अनुसार, उसकी मुलाकात 23 मार्च 2012 को शाहजहांनाबाद स्थित आर्मी कैंटीन में हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई और 25 दिसंबर 2012 को पहली बार शारीरिक संबंध बने। महिला का आरोप था कि बाद में भी कई बार संबंध बनाए गए।
2013 में ही पता चल गया था कि आरोपी शादीशुदा है
महिला का आरोप था कि वर्ष 2013 में उसे पता चला कि आरोपी पहले से शादीशुदा है, लेकिन आरोपी ने पत्नी से अलग होने और तलाक लेकर उससे शादी करने का भरोसा दिया। इसी भरोसे पर दोनों के बीच संबंध 2025 तक जारी रहे। बाद में जब महिला को पता चला कि आरोपी अन्य महिलाओं से भी संपर्क में है, तब उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
अदालत ने कहा- यह सहमति से बना रिश्ता
सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. घिल्डियाल और अधिवक्ता अवधेश कुमार अहिरवार ने पक्ष रखा। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता को वर्ष 2013 में ही आरोपी के शादीशुदा होने की जानकारी मिल चुकी थी, इसके बावजूद उसने कई वर्षों तक संबंध जारी रखे और इस दौरान कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई। कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक चला यह संबंध स्वेच्छा और आपसी सहमति का परिणाम प्रतीत होता है। इसलिए इस मामले में बलात्कार या धोखे से सहमति लेने का अपराध नहीं बनता।
कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस परिस्थिति में दर्ज की गई एफआईआर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होती है। इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर, चार्जशीट और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट का आदेश देखें MCRC-35779-2025
