हाईकोर्ट ने माना- गोरखपुर टीआई की रिपोर्ट एसपी ने नहीं परखी और कलेक्टर को भेजी
जबलपुर | जबलपुर से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी जिला बदर (Externment) के आदेश को पूरी तरह अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीज़न बेंच ने कहा कि यह आदेश गलत, अधूरे और कथित रूप से गढ़े गए तथ्यों पर आधारित था। टीआई नितिन कमल द्वारा दी गई रिपोर्ट एसपी को भेजी गई। एसपी ने भी रिपोर्ट को परखे बिना मान लिया कि याचिकाकर्ता पर मामले हैं। वही रिपोर्ट उन्होंने कलेक्टर को भेजी और वहां पर भी रिपोर्ट जांचे बिना जिला बदर का आदेश जारी कर दिया गया। बेंच ने यहाँ तक कहा कि जब पूरी जानकारियां ऑनलाइन मौजूद हैं और आपराधिक मामलों की जानकारी के लिए CCTNS तकनीक मौजूद है, तो कम से कम अधिकारी आदेश देने से पहले एक बार तसल्ली तो कर लेते कि टीआई द्वारा दी गई रिपोर्ट सही है भी या नहीं।
कोर्ट में हुए चुकाने वाले खुलासे
याचिकाकर्ता के वकील Alphine Mathews ने बताया कि 7 में से 3 मामलों में पहले ही जमानत मिल चुकी थी। यानी प्रशांत सिंह को “फरार” बताना तथ्यात्मक रूप से गलत था।
एक मामले में घायल Krish Goswami की MLC रिपोर्ट रिकॉर्ड में नहीं मिली। SHO नितिन कमल ने कहा कि चार्जशीट के बाद MLC उपलब्ध नहीं। कोर्ट ने इसे “बेहद कमजोर और अविश्वसनीय बहाना” माना।
एक अन्य केस में घायल चिराग गुप्ता ने अपने बयान में साफ कहा कि हमलावर कौन था, उसे नहीं पता। इसके बावजूद आरोपी के रूप में प्रशांत सिंह का नाम जोड़ दिया गया।
पुलिस ने आरोप लगाया कि आरोपी ने अपराध के वीडियो वायरल किए, लेकिन SI दीपक मंडलोई ने कोर्ट में माना कि कोई वीडियो जब्त ही नहीं हुआ।
टेक्नोलॉजी होते हुए भी नहीं किया सत्यापन
कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और प्रशासन ने Crime and Criminal Tracking Network and Systems (CCTNS) जैसे आधुनिक सिस्टम का उपयोग ही नहीं किया, जिससे सच्चाई आसानी से सामने आ सकती थी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा:
“जब आदेश की नींव ही गलत और गढ़े गए तथ्यों पर आधारित हो, तो ऐसा आदेश कानून में टिक नहीं सकता।”
इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस विवेक अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीज़न बेंच ने याचिकाकर्ता के खिला जारी किये गए जिला बदर के आदेश को खारिज कर दिया।
