LAW'S VERDICT

CM मोहन यादव के एक्शन से सस्पेंड CEO धनवाल पर दस्तावेज रुकवाने का आरोप

सरकार और बैंक ने धनवाल के पत्र का हवाला देकर किया खुलासा, हाईकोर्ट में सुनवाई अब 8 को 

जबलपुर। जिला केंद्रीय सहकारी बैंक, सीधी के निलंबित सीईओ पीएस धनवाल से जुड़े मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने गंभीर आरोप लगाए हैं। सरकार के जवाब से केस में नया मोड़ आ गया है।

राज्य सरकार और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ने कोर्ट में जवाब देकर दावा किया है कि धनवाल को मुख्यमंत्री के कथित निर्देशों के कारण नहीं, बल्कि उनकी खुद की वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के चलते निलंबित किया गया है। वित्तीय अनियमिताओं की जांच के लिए गठित 5 सदस्यीय समिति को दस्तावेज देने से रोकने के लिए खुदधनवाल ने अपने ही कर्मचारियों को पत्र जारी  करके समिति को उनसे जुड़े दस्तावेज न देने कहा था। 

जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप

सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता गिरीश केकरे और बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरप्रीत रूपराह व अधिवक्ता कपिल दुग्गल ने कोर्ट को बताया कि बैंक में गड़बड़ियों की जांच के लिए समिति बनाई गई थी, लेकिन धनवाल ने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को दस्तावेज उपलब्ध न कराने के निर्देश दिए थे। सरकार का यह आरोप इस मामले को और गंभीर बना रहा है, क्योंकि यह जांच में बाधा डालने से जुड़ा है।

हाईकोर्ट का निर्देश

जस्टिस एमएस भट्टी की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता धनवाल को एक सप्ताह में रिजॉइंडर (जवाब दावा) दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को तय की है। 

CM मोहन यादव की दौरे के बाद सस्पेंड हुए थे धनवाल 

22 मार्च को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सीधी जिले का औचक निरीक्षण किया था। बैंक में गड़बड़ियों की शिकायत मिलने पर बैंक के सीईओ धनवाल के तत्काल निलंबन के निर्देश दिए गए थे। उसी दिन जारी हुए निलंबन आदेश को धनवाल ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है।  

सोमवार को चार्जशीट और मंगलवार को रिटायरमेन्ट

सरकार ने सोमवार 30 मार्च को धनवाल को शोकॉज नोटिस और चार्जशीट थमा दी है।  उसके बाद मंगलवार 31 मार्च को वो रिटायर भी हो गए। हालाँकि इस मामले पर हाईकोर्ट ने 26 मार्च को सुनवाई करते हुए कहा था कि सरकार की कार्रवाई इस मामले पर होने वाले फैसले के अधीन रहेगी।   

अब आगे क्या होगा ?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या धनवाल अपने खिलाफ लगे आरोपों का संतोषजनक जवाब दे पाएंगे? और क्या जांच में बाधा डालने का उनपर लगा आरोप साबित होगा? यह मामला अब सिर्फ निलंबन तक सीमित नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, जांच प्रक्रिया और जवाबदेही का अहम परीक्षण बन चुका है।

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