इलाहाबाद बैंक की याचिका पर मप्र हाईकोर्ट ने सुनाया अहम फैसला, लोकायुक्त के डीएसपी की शिकायत पर हुई थी FIR
जबलपुर। 970 लाख रुपए के बैंक लोन डिफॉल्ट से जुड़े मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद बैंक के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह पूरी तरह सिविल विवाद था, जिसे गलत तरीके से आपराधिक रंग दिया गया। जस्टिस बीपी शर्मा की सिंगल बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में कहीं भी बैंक की धोखाधड़ी की मंशा साबित नहीं होती। सभी प्रक्रिया नियमों और दस्तावेजों के अनुसार की गई। गारंटर ने खुद अपनी सहमति से संपत्ति गिरवी रखी थी।
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 2010 में स्पार्टा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट के नाम पर 970 लाख रुपए का लोन इलाहाबाद बैंक से लिया गया था। लोन की गारंटी के तौर पर विदिशा स्थित संपत्ति गिरवी रखी गई। बाद में लोन का भुगतान नहीं हुआ और खाता NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) बन गया। जब बैंक ने वसूली प्रक्रिया शुरू की, तो बैंक अधिकारियों पर लोकायुक्त के डीएसपी राजकुमार शर्मा की शिकायत पर धोखाधड़ी, जालसाजी और विश्वासघात जैसे आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज की गई।
FIR पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता राजकुमार शर्मा का पुत्र लोन लेने वाली समिति में सेक्रेटरी था। एफआईआर 25 दिसंबर 2013 को दर्ज की गई। यह वही समय था जब बैंक ने SARFAESI Act के तहत रिकवरी शुरू की थी। इससे साफ है कि एफआईआर का उद्देश्य बैंक की कार्रवाई को रोकना और दबाव बनाना था।
सिविल बनाम क्रिमिनल विवाद
कोर्ट ने साफ किया कि यह मामला लोन वसूली से संबंधित सिविल प्रकृति का था, पर इसे गलत तरीके से आपराधिक केस में बदला गया। यह कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Law) है।
हाईकोर्ट ने FIR की रद्द
मामले पर अपना फैसला देते हुए हाईकोर्ट ने हबीबगंज थाने में 25 दिसंबर 2013 को दर्ज हुई एफआईआर को दुर्भावनापूर्ण मानते हुए रद्द किया गया। हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि हर वित्तीय विवाद को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता और कानून का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।
क्यों है यह फैसला अहम?
हाईकोर्ट के इस फैसले से न सिर्फ बैंकिंग मामलों में क्रिमिनल केस के दुरुपयोग पर रोक लगेगी, बल्कि लोन डिफॉल्ट को लेकर यह फैसला भविष्य में महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।
हाईकोर्ट का आदेश देखें MCRC-212-2015
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