LAW'S VERDICT

कर्ज वापस माँगना अपराध नहीं, आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं बनता


ग्वालियर हाईकोर्ट ने खारिज किया युवक पर लगे आत्महत्या के लिए उकसाने का चार्ज 

ग्वालियर | मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि केवल कर्ज की वापसी की मांग करना आत्महत्या के लिए उकसावा (Abetment) नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर जस्टिस पुष्पेंद्र यादव ने गुना की अदालत में एक व्यक्ति की खिलाफ चल रहे धारा 306 के मुकदमे को ख़ारिज कर दिया। 

यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका गुना के पुरापोसर में रहने वाले रिंकू लोढ़ा की और से दायर की गई थी।  याचिका में 08 दिसंबर 2022 को सत्र न्यायालय, गुना द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी। सत्र न्यायालय ने याचिकाकर्ता के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने (Section 306 IPC) का आरोप तय किया था।  प्रकरण के अनुसार 13 सितंबर 2022 की रात लगभग 9 बजे भगवन सिंह ने माता मंदिर, गुना परिसर में लगे सीमेंट के खंभे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। 14 सितंबर 2022 को रात 1:53 बजे मर्ग  दर्ज हुआ। मृतक के भाई ने मर्ग सूचना में आत्महत्या का कारण अज्ञात बताया। मौके से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ था। 

पुलिस जांच में क्या सामने आया

जांच के दौरान मृतक के परिजनों ने आरोप लगाया कि मृतक ने याचिकाकर्ता से 1 लाख रुपये उधार लिए थे। याचिकाकर्ता पैसे की वापसी के लिए भगवन सिंह पर दबाव बना रहा था। घटना वाले दिन मृतक की मोटरसाइकिल याचिकाकर्ता ने अपने पास रख ली थी। इसी कथित प्रताड़ना के कारण मृतक ने आत्महत्या की। इन्हीं बयानों के आधार पर पुलिस ने चालान पेश किया और सत्र न्यायालय ने धारा 306 IPC के तहत आरोप तय कर दिए।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मानवेन्द्र सिंह तोमर की दलील थी कि आत्महत्या के लिए उकसावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।  केवल पैसे की मांग या मोटरसाइकिल अपने पास रखना धारा 107 IPC के तहत उकसावा नहीं माना जा सकता।  घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला। परिजनों के बयान भी पूरे पढ़ने पर भी उकसावे का अपराध नहीं बनता। 

हाईकोर्ट का अहम अवलोकन

हाईकोर्ट ने कहा उकसावे का अपराध मंशा (intention) पर निर्भर करता है। केवल कर्ज की मांग करना सामान्य व्यवहार है। कोई व्यक्ति यदि आत्महत्या कर ले, तो कर्ज की वसूली असंभव हो जाती है। ऐसे में यह मानना तर्कसंगत नहीं कि पैसे मांगने वाला व्यक्ति आत्महत्या के लिए उकसाना चाहेगा।  हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि याचिकाकर्ता का कृत्य धारा 306 IPC को आकर्षित नहीं करता। सत्र न्यायालय द्वारा आरोप तय करना कानूनी त्रुटि है। ऐसे आधारों पर याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से ट्रायल का सामना नहीं कराया जा सकता। इस मत के साथ अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ चल रहे मुकदमे को खारिज कर दिया। 

CRR-13-2023

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