हाईकोर्ट ने खारिज की टाइटल डिक्लेरेशन की अर्जी, कहा- SARFAESI के मामलों में DRT ही एकमात्र मंच
जबलपुर। बैंकों के खिलाफ सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर कार्रवाई रोकने की कोशिश पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस विवेक जैन की कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब संपत्ति पहले से बैंक के पक्ष में मॉर्गेज हो और उसके बाद कोई खरीददार सामने आए, तो वह सीधे सिविल कोर्ट में जाकर बैंक की कार्रवाई को चुनौती नहीं दे सकता। ऐसे मामलों में उपाय केवल Securitization and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest Act, 2002 (SARFAESI Act) के तहत ही उपलब्ध है। हाईकोर्ट का यह निर्णय साफ संकेत देता है कि बैंकिंग रिकवरी मामलों में सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर SARFAESI की कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता। बाद का खरीददार भी सीधे DRT का रुख करेगा, सिविल कोर्ट का नहीं।
बेची थी बैंक में गिरवी रखी सम्पत्ति
विवादित संपत्ति को वर्ष 2019 में छतरपुर जिले की नौगाँव तहसील के ग्राम पचवारा में रहने वाले हरविंद यादव ने बैंक के पास ऋण के एवज में गिरवी रखा था। इसके बावजूद वर्ष 2023 में उसी संपत्ति को रामदेवी राजपूत ने खरीद लिया और बिक्री के दस्तावेजों के आधार पर स्वयं को वैध स्वामी घोषित करने तथा एयू स्माल फाइनेंस बैंक को हस्तक्षेप से रोकने की मांग करते हुए सिविल सूट दायर कर दिया।
बैंक की आपत्ति हुई थी खारिज
Au small फाइनेंस बैंक ने ट्रायल कोर्ट में Order 7 Rule 11 CPC के तहत आवेदन देकर कहा कि धारा 34 SARFAESI Act के अनुसार सिविल कोर्ट को ऐसे मामलों में अधिकार नहीं है। बावजूद इसके ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि वादी “बोना फाइड परचेजर” है और उसके सिविल अधिकारों का निर्णय सिविल कोर्ट ही कर सकता है। ट्रायल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ एयू स्माल फाइनेंस कंपनी ने यह मामला हाईकोर्ट में दाखिल किया था।
हाईकोर्ट ने अपनाया कड़ा रुख
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि SARFAESI Act की धारा 17 के तहत “any person” को Debts Recovery Tribunal (DRT) में अपील का अधिकार है, जिसमें बाद का खरीददार भी शामिल है। धारा 34 स्पष्ट रूप से सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है। “सिक्योरिटी एग्रीमेंट” और “सिक्योरिटी इंटरेस्ट” की परिभाषा केवल रजिस्टर्ड मॉर्गेज तक सीमित नहीं है। बैंक द्वारा की गई कार्रवाई को रोकने के उद्देश्य से सिविल सूट दायर किया गया, जो विधि द्वारा वर्जित है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चाहे दस्तावेज़ को एग्रीमेंट कहा जाए या मॉर्गेज डीड, यदि उससे सुरक्षा हित (Security Interest) निर्मित होता है, तो वह SARFAESI Act के दायरे में आएगा।
ट्रायल कोर्ट का आदेश निरस्त हुआ
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का 01 अगस्त 2025 का आदेश निरस्त करके सिविल कोर्ट में रामदेवी राजपूत का मुकदमा खारिज कर दिया। साथ ही रामदेवी को 30 दिनों के भीतर DRT में धारा 17 के तहत जाने की स्वतंत्रता दी करके मामले का पटाक्षेप कर दिया। बैंक की ओर से अधिवक्ता मल्लिकार्जुन खरे ने पैरवी की।
हाईकोर्ट का आदेश देखें CR-1190-2025
