हाईकोर्ट ने कहा- पूर्व अनुमति के बिना शिकायत पर लिया गया संज्ञान अवैध
जबलपुर। सागर में जैन समाज की धार्मिक भावनाएं आहत करने और मानहानि के आरोपों से जुड़े बहुचर्चित मामले में चल रहे मुकदमे को मप्र हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है। आपराधिक प्रकरण में हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धारा 295-A IPC के तहत अभियोजन चलाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति जरूरी है। बिना वैधानिक स्वीकृति के लिया गया संज्ञान शून्य माना जाएगा। इस मत के साथ जस्टिस हिमांशु जोशी की अदालत ने मामले के शिकायतकर्ता संजय जैन की ओर से दाखिल दो याचिकाएं खारिज कर दीं।
आपत्तिजनक सामग्री बांटने का आरोप
शिकायतकर्ता संजय जैन ने सागर के कोतवाली थाने में शिकायत देकर आरोप लगाया था कि उप्र के ललितपुर में रहने वाले मुन्नालाल जैन व अन्य ने लिखित सामग्री प्रसारित कर एक पूज्य धार्मिक व्यक्तित्व के विरुद्ध आपत्तिजनक व मानहानिकारक टिप्पणियां कीं, जिससे धार्मिक भावनाएं भड़काने का प्रयास हुआ। पुलिस ने 17 दिसंबर 2022 को IPC की धाराओं 295-A, 500, 501 व 502 के तहत FIR दर्ज की और 14.02.2023 को चालान पेश किया। 15 फरवरी 2023 को ट्रायल कोर्ट ने संज्ञान भी ले लिया।
कानूनी पेच: धारा 196 CrPC के तहत पूर्व स्वीकृति नहीं
यह निर्विवाद था कि जब संज्ञान लिया गया, तब तक Code of Criminal Procedure, 1973 की धारा 196 के तहत आवश्यक पूर्व अनुमति प्राप्त नहीं थी। बाद में 17 अगस्त 2023 को राज्य शासन के गृह विभाग ने स्वीकृति दी, लेकिन तब तक अदालत संज्ञान ले चुकी थी। आरोपियों ने 14 मार्च 2024 को डिस्चार्ज आवेदन दिया, जिसे JMFC सागर ने खारिज कर आरोप तय कर दिए। इसके विरुद्ध आरोपी ने सेशन कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
सेशन कोर्ट का फैसला
03 अगस्त 2024 को सागर के तीसरे अपर सत्र न्यायाधीश ने कहा कि पूर्व स्वीकृति के बिना लिया गया संज्ञान अधिकार क्षेत्र से परे है। यह त्रुटि सुधार योग्य नहीं, बल्कि मूलभूत अवैधता है। इसलिए समस्त कार्यवाही निरस्त की जाती है। अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 07 अगस्त 2024 को JMFC ने पुनरीक्षण आदेश के अनुपालन में मामला रिकॉर्ड रूम भेज दिया।
सुनवाई में दी गईं ये दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने विवादित आदेशों का विरोध करते हुए कहा कि निचली अदालतों ने मामले को बहुत अधिक तकनीकी तरीके से देखा, जिसके कारण न्याय में त्रुटि हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि जब अदालत ने संज्ञान लिया था, उस समय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 196 के तहत आवश्यक स्वीकृति उपलब्ध नहीं थी, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने 17 अगस्त 2023 को स्वीकृति दे दी। इसलिए अब वह कमी दूर हो चुकी है। वहीं सरकार की ओर से कहा गया कि आईपीसी की धारा 196 के तहत स्वीकृति लेना अनिवार्य है। बिना इस स्वीकृति के अदालत संज्ञान नहीं ले सकती। यह भी कहा गया कि संज्ञान के समय स्वीकृति का न होना केवल एक साधारण प्रक्रिया संबंधी गलती नहीं है, बल्कि यह सीधे अदालत के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित करता है। यदि कानून में लगाए गए इस प्रतिबंध के बावजूद संज्ञान लिया गया है, तो वह शुरुआत से ही अमान्य (void ab initio) माना जाएगा। बाद में दी गई स्वीकृति से उस गलती को ठीक या वैध नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सेशन कोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल की गई पुनरीक्षण याचिका पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय State of Haryana v. Bhajan Lal का हवाला देते हुए कहा धारा 196 CrPC के तहत स्वीकृति “Mandatory Pre-condition” है। बाद में दी गई स्वीकृति पूर्व अवैध संज्ञान को वैध नहीं बना सकती। जब मूल संज्ञान ही अवैध है, तो आरोप निर्धारण सहित आगे की पूरी कार्यवाही स्वतः शून्य हो जाती है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि IPC की धाराएं 500, 501, 502 स्वतंत्र रूप से चल सकती थीं। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि पूरा मामला एक ही समग्र घटना से उत्पन्न था, और धारा 295-A उसका मूल आरोप था। इसलिए चयनात्मक रूप से कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।
पुनरीक्षण याचिका खारिज हुईं
हाईकोर्ट ने 03 अगस्त 2024 का पुनरीक्षण आदेश बरकरार रखते हुए 07 अगस्त 2024 का परिणामी आदेश भी वैध माना और दोनों पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज कर दीं। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि विधि अनुसार भविष्य में सक्षम प्राधिकारी उचित कदम उठाना चाहे तो वह स्वतंत्र होगा। प्रकरण में अनावेदक मुन्नालाल जैन की ओर से अधिवक्ता विवेक रंजन पांडेय ने पैरवी की।
हाईकोर्ट का फैसला देखें MCRC-38623-2024
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