8 साल की मासूम से दुष्कर्म के आरोपी की उम्रकैद की सजा रखी बरकरार
जबलपुर। 8 वर्षीय बालिका से दुष्कर्म के मामले में मप्र हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए सीधी जिले की विशेष अदालत द्वारा आरोपी को दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीज़न बेंच ने स्पष्ट किया है कि दुष्कर्म के अपराध में पूर्ण प्रवेश (complete penetration) आवश्यक नहीं है। मामूली प्रवेश (slightest penetration) भी अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। सभी साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर डिवीज़न बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 376 IPC और POCSO Act की धारा 3/4 के तहत दी गई सजा को सही ठहराया और आरोपी की अपील खारिज कर दी।
घटना के अगले दिन हुई थी रिपोर्ट
अभियोजन के अनुसार घटना 17 फरवरी 2014 की रात लगभग 8:30 बजे की है। उस समय पीड़िता की आयु मात्र 8 वर्ष थी। जन्मतिथि 08 अगस्त 2005 प्रमाणित हुई और बचाव पक्ष ने जिरह में आयु को चुनौती नहीं दी। पीड़िता ने अदालत में बताया कि आरोपी लाले उर्फ़ लल्लू रावत ने उसके अंडरगारमेंट के अंदर हाथ डालकर उसके साथ जबरन दुष्कर्म किया, जिससे रक्तस्राव होने लगा। उसके शोर मचाने पर भाभी के पहुंचने से आरोपी मौके से भाग गया। अगले दिन पुलिस थाना बहरी में रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
मेडिकल रिपोर्ट में हुई थी पुष्टि
मेडिकल परीक्षण करने वाली महिला डॉक्टर ने पीड़िता के निजी अंग पर घाव पाया। उसके कपड़ों पर खून के धब्बे भी मिले। डॉक्टर ने अपने मत में कहा कि “यौन संबंध बनाने का प्रयास किया गया”, जिसे आधार बनाकर बचाव पक्ष ने सजा निरस्त करने की मांग की।
बचाव पक्ष ने दी अटेम्प्ट की दलील
आरोपी की ओर से तर्क दिया गया कि पूर्व विवाद के कारण झूठा फंसाया गया, गवाहों के बयान में विरोधाभास हैं, मेडिकल रिपोर्ट में ‘अटेम्प्ट’ शब्द का प्रयोग है और पूर्ण दुष्कर्म साबित ही नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने खारिज की दलील
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता की आयु 10 वर्ष से कम होना निर्विवाद है, पीड़िता का बयान विश्वसनीय और स्पष्ट है और रक्तस्राव और चोट मेडिकल साक्ष्य से प्रमाणित है। कोर्ट ने दोहराया कि बलात्कार सिद्ध करने के लिए पूर्ण प्रवेश आवश्यक नहीं है। आंशिक प्रवेश भी पर्याप्त है। केवल डॉक्टर द्वारा “अटेम्प्ट” कह देने से अपराध की प्रकृति कम नहीं हो जाती।
हाईकोर्ट का फैसला देखें CRA-565-2016
