LAW'S VERDICT

कोर्ट से ‘चीटिंग’ करने पर विवेचना अधिकारी के खिलाफ होगी FIR

 मप्र हाईकोर्ट ने कहा- सर्कुलर जारी कर सभी को समझाओ 

जबलपुर। आपराधिक मामलों के ट्रायल में आधे-अधूरे दस्तावेज पेश करना ‘बौद्धिक बेइमानी’ है। यह सख्त टिप्पणी करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने डीजीपी को परिपत्र जारी करने के निर्देश दिए हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि कोई विवेचना अधिकारी कोर्ट से तथ्य छिपाता पाया गया, तो संबंधित न्यायालय उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे सकता है। यह आदेश राज्य सरकार की अपील पर पारित किया। हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले को पुलिस महकमे में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

सरकार ने दाखिल की थी अपील 

खण्डवा जिले में एक महिला की 23 जुलाई 2020 को मोघट रोड थाना क्षेत्र में जलने से मौत हो गई थी। महिला का निकाह 1 अप्रैल 2018 को हुआ था। राज्य सरकार का तर्क था कि शादी के सात वर्ष के भीतर हुई मौत पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-बी (दहेज मृत्यु की धारणा) लागू होनी चाहिए। हालांकि, खण्डवा की ट्रायल कोर्ट ने 18 दिसंबर 2024 को आरोपी सलमान उर्फ सलाम व अन्य को भादंवि की धारा 498ए और 304बी के आरोपों से बरी कर दिया। सरकार ने दोषमुक्ति को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

मृत्युपूर्व बयान बने निर्णायक

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि 23 जुलाई 2020 को जिला अस्पताल, खंडवा में मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज मृतिका के मृत्युपूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) में उसने स्पष्ट कहा था कि खाना बनाते समय मिट्टी तेल गिरने से आग लगी और किसी ने उसे प्रताड़ित नहीं किया। डॉ. मधु ने भी प्रमाणित किया था कि बयान के समय मृतका पूर्ण होश में थी। कोर्ट ने पाया कि यह महत्वपूर्ण बयान केस डायरी में मौजूद होने के बावजूद विवेचना अधिकारी ने इसे चार्जशीट के साथ प्रस्तुत नहीं किया।

एसडीओपी जवाब देने में असफल

मामले के जांच अधिकारी, एसडीओपी ललित गठरे, यह स्पष्ट नहीं कर सके कि मृत्युपूर्व बयान चार्जशीट के साथ क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया। बेंच ने इसे ‘बौद्धिक बेईमानी’ करार देते हुए कहा कि न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास अस्वीकार्य है।

डीजीपी को निर्देश

दहेज हत्या के ठोस प्रमाण न पाए जाने पर राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि भविष्य में यदि कोई जांच अधिकारी महत्वपूर्ण साक्ष्य छिपाता पाया गया, तो उसके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने तक की कार्रवाई की जा सकती है।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  CRA-6441-2025


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