विभागीय जांच में बड़ी चूक के कारण इंक्रीमेंट रोकने की सजा हाईकोर्ट से रद्द
ग्वालियर। ट्राइबल वेलफेयर विभाग में पदस्थ एक वार्डन के खिलाफ वित्तीय अनियमितता के आरोप में रोकी गई वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) की सजा को हाईकोर्ट ने अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। जस्टिस आशीष श्रोती की अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय जांच रिपोर्ट की प्रति दिए बिना दंडादेश पारित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता निर्मल सिंह चौहान की प्रारंभिक नियुक्ति सहायक शिक्षक के रूप में हुई थी। उन्हें लश्कर के श्रीराम कॉलोनी में स्थित पोस्ट-मैट्रिक बॉयज हॉस्टल नंबर 2, 3 व 4 में वार्डन पद पर पदस्थ किया गया। बाद में उनका स्थानांतरण बेहट, ग्वालियर स्थित छात्रावास में किया गया। छात्रावास में पदस्थापना के दौरान छात्रवृत्ति राशि के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। छह सदस्यीय समिति की प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथमदृष्टया सही पाए गए। इसके बाद कलेक्टर द्वारा 20 मार्च 2020 को आरोप-पत्र जारी कर तीन आरोप लगाए गए।
शासकीय धन के दुरूपयोग के लगे आरोप
आरोप था कि छात्रवृत्ति की राशि का उपयोग छात्रावास की मरम्मत और रखरखाव में किया गया, जो नियम विरुद्ध है। विभाग का दावा था कि शासकीय धन का दुरुपयोग हुआ। याचिकाकर्ता ने 24 जुलाई 2020 को जवाब प्रस्तुत कर आरोपों से इंकार किया। उनका कहना था कि छात्रावास में मरम्मत कार्य छात्रों की शिकायतों के बाद मौखिक निर्देशों पर कराया गया और राशि व्यक्तिगत उपयोग में नहीं लाई गई।
विभागीय जांच और सजा
संयुक्त कलेक्टर को जांच अधिकारी तथा सहायक आयुक्त को प्रस्तुतिकरण अधिकारी नियुक्त किया गया। 05 अक्टूबर 2021 को प्रस्तुत रिपोर्ट में आरोप क्रमांक 1 और 3 सिद्ध, जबकि आरोप क्रमांक 2 आंशिक रूप से सिद्ध पाया गया। इसके आधार पर 20 दिसंबर 2021 को कलेक्टर ने याचिकाकर्ता की चार वेतनवृद्धियां संचयी प्रभाव से रोकने की सजा दी। अपील पर 02 मई 2023 को सजा को संशोधित कर दो वेतनवृद्धियां बिना संचयी प्रभाव के रोकने की लघु दंड में परिवर्तित किया गया।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया आदेश
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील डीपी सिंह की दलील थी कि जांच रिपोर्ट की प्रति याचिकाकर्ता को कभी उपलब्ध नहीं कराई गई। न तो कलेक्टर के आदेश से पहले रिपोर्ट दी गई और न ही अपीलीय प्राधिकारी ने इस गंभीर त्रुटि पर विचार किया। यहां तक कि न्यायालय में भी जांच रिपोर्ट रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं की गई।
इन दलीलों पर अदालत ने कहा कि जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराना अनिवार्य है, बिना रिपोर्ट दिए दंड देना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है और अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस महत्वपूर्ण बिंदु की अनदेखी की।
कोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने 20 दिसंबर 2021 और 02 मई 2023 दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया। मामला पुनः कलेक्टर को भेजते हुए निर्देश दिया गया कि पहले याचिकाकर्ता को जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराई जाए। याचिकाकर्ता से स्पष्टीकरण लिया जाए और यदि आवश्यक हो तो सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रकरण प्रस्तुत किया जाए। यह कार्यवाही 90 दिनों के भीतर पूर्ण करने का निर्देश दिया गया है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WRIT PETITION No.12832 OF 2023
