भरण पोषण के मामले पर पति की याचिका ठुकराकर मप्र हाईकोर्ट ने दो टूक कहा-
जबलपुर। पत्नी के पढ़े लिखे होने को आधार बनाकर उसको भरण पोषण की राशि देने से बच रहे एक पति की याचिका मप्र हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दी है पति की दलीलों को सिरे से ठुकराते हुए जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की बेंच ने दो टूक कहा- पति क्या चाहता है, उसकी पढ़ी लिखी पत्नी गुजारा भत्ते के इन्तजार में चौराहे पर बैठकर भीख मांगे। बेंच ने कहा- भारत में वैसे भी रोजगार की स्थिति किसी से नहीं छिपी है। यदि पत्नी सम्मान के साथ किसी दुकान में काम कर भी रही है, तो भी पति यह नहीं कह सकता कि वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने भरणपोषण के रूप में हर माह 6 हजार रूपए की राशि देने के फैसले को बरकरार रखा है।
2021 में हुई थी शादी
रीवा में रहने वाले कमल की शादी जून 2021 में पूनम से हुई थी। कमल का आरोप था कि शादी के कुछ महीनों के बाद ही पूनम अपना सामान लेकर मायके चली गई और फिर उसने ससुराल वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी। उसके बाद कमल से भरण पोषण की राशि पाने पूनम ने निचली अदालत में एक अर्जी दाखिल की। फैमिली कोर्ट ने 27 मई 2024 को पूनम को गुजारा भत्ता के रूप में हर माह 6 हजार रूपए देने के आदेश दिए थे। इसी आदेश को चुनौती देकर यह पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी।
निचली अदालत ने गलत आदेश दिया: पति
पति आवेदक पति ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने उसकी आय का आकलन अनुमान के आधार पर किया। “कमल सुपर बाजार” दुकान उसके बड़े भाई समरजीत की है और उसमें उसका (कमल का) कोई हिस्सा नहीं। उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है। ऐसे में उसे भरण पोषण की राशि देने बाध्य नहीं किया जा सकता। कमल का यह भी दावा था कि पूनम उच्च शिक्षित (एम.ए. राजनीतिक विज्ञान) है और स्वयं नौकरी करके अच्छी खासी रकम कमा सकती है।
भारत में नौकरियां मिल ही कहा रहीं: कोर्ट
पूनम के वकील सुमित तिवारी की दलीलों पर गौर करने के बाद जस्टिस सिंह की अदालत ने अपना फैसला सुनाया। बेंच ने कहा- मास्टर डिग्री होने के बाद भी भारत में नौकरियाँ आसानी से मिल कहाँ रही हैं। ऐसा भी नहीं कि 4 नौकरियां मौजूद हैं और उसके लिए सिर्फ एक ही दावेदार हो। आबादी के अनुपात और योग्य युवाओं और सक्षम उम्मीदवारों के अनुपान में भारी असामनता है। ये एक सामान्य ज्ञान की बात है, जिसे किसी भी सबूत या दलील की जरूरत नहीं है।
पति की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती
अपने फैसले में जस्टिस सिंह ने कहा- पत्नी का उच्च शिक्षित होना उसे भरण-पोषण से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता। पत्नी यदि अपनी आजीविका चलाने छोटा-मोटा काम कर भी रही है, तब भी पति अपनी वैध जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। फैमिली कोर्ट के आदेश को न्यायसंगत और उचित बताकर हाईकोर्ट ने पति कमल को आदेश दिए कि वो हर माह पत्नी पूनम को ₹6000 चुकाए।