LAW'S VERDICT

GRMC ग्वालियर के अधीक्षक डॉ. गिरजा शंकर गुप्ता को मिली हाईकोर्ट से आंशिक राहत

प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन पर विभागीय कार्यवाही रद्द, फिर से शुरू होगी जांच

ग्वालियर। Gajara Raje Medical College (जीआरएमसी) के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में अधीक्षक पद पर पदस्थ डॉ. गिरजा शंकर गुप्ता को Madhya Pradesh High Court से आंशिक राहत मिली है। जस्टिस आशीष श्रोती की कोर्ट ने डॉ. गुप्ता के खिलाफ की गई विभागीय जांच की पूरी कार्यवाही को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के आधार पर निरस्त कर दिया है। अदालत ने डीन को निर्देश दिया है कि वे चार्जशीट की विधिवत सेवा से जांच दोबारा शुरू करें।

चार्जशीट पर उठाये थे सवाल 

डॉ. गुप्ता की नियुक्ति 06 अगस्त 2019 को अधीक्षक (अधीक्षक) पद पर हुई थी। बाद में शिकायत प्राप्त हुई कि उन्होंने कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की है। इस पर डॉ. गुप्ता को  31 जुलाई 2025 को शो-कॉज नोटिस जारी किया गया। 21 नवंबर 2025 को एक चार्जशीट दी गई, जिस पर जांच अधिकारी और प्रस्तुतिकर्ता अधिकारी दोनों के संयुक्त हस्ताक्षर थे। बाद में 16 दिसंबर 2025 को उक्त चार्जशीट वापस लेते हुए 30 अक्टूबर 2025 की एक अन्य चार्जशीट का हवाला दिया गया, जिसे डीन द्वारा जारी बताया गया। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि 30 अक्टूबर 2025 की चार्जशीट उन्हें कभी विधिवत प्राप्त नहीं हुई और न ही आरोपों से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए।

प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ 

अपने फैसले में जस्टिस श्रोती ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत विभागीय जांच प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना अनिवार्य है। न्यायालय ने कहा कि कर्मचारी को आरोपों की प्रति और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराना अनिवार्य है। जांच निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित होनी चाहिए और जांच को औपचारिकता या “क्लोज्ड माइंड” से नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पाया कि प्रारंभ से लेकर जांच रिपोर्ट तक की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ है।

फिर से की जाए कार्रवाई 

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी और प्रस्तुतिकर्ता अधिकारी द्वारा की गई पूरी कार्यवाही निरस्त। डीन को निर्देश दिए गए कि वे चार्जशीट की विधिवत सेवा से पुनः जांच प्रारंभ करें। आवश्यकता हो तो डीन स्वयं जांच करें या योग्य अधिकारी नियुक्त करें। याचिकाकर्ता को आरोप सिद्ध करने हेतु उपयोग किए जा रहे सभी दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। प्रासंगिक दस्तावेज मांगने का अधिकार भी याचिकाकर्ता को रहेगा।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  WP-50553-2025

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