मप्र हाईकोर्ट का फैसला: कहा- फोटोकॉपी पर स्टाम्प ड्यूटी तय नहीं हो सकती, याचिका खारिज
भोपाल।
हाईकोर्ट ने स्टाम्प एक्ट और साक्ष्य कानून से जुड़े एक अहम मामले में सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि एग्रीमेंट टू सेल की फोटोकॉपी पर न तो स्टाम्प ड्यूटी का निर्धारण किया जा सकता है और न ही उसे इम्पाउंड किया जा सकता है। जस्टिस विवेक जैन की अदालत ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए वादी की याचिका को खारिज कर दिया। मामला सोहागपुर में स्थित 2030 वर्ग फुट जमीन के दावे का था।
मामले में शहडोल में रहने वाले दिनेश गुप्ता और उसकी पत्नी विमला ने सिविल कोर्ट के 08 दिसंबर 2025 के उस आदेश को मप्र हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 33 के तहत उनकी ओर से दायर आवेदन को खारिज कर दिया गया था। साथ ही ट्रायल कोर्ट द्वारा एग्रीमेंट टू सेल की फोटोकॉपी को साक्ष्य के रूप में exhibit (प्रदर्शित) करने से इनकार किए जाने को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसने विवादित प्लाट के title (घोषणा) और permanent injunction (स्थायी निषेधाज्ञा) के लिए एग्रीमेंट टू सेल के आधार पर वाद दायर किया है। पहले ही 22 अक्टूबर 2024 को ट्रायल कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65 के तहत फोटोकॉपी के आधार पर secondary evidence (द्वितीयक साक्ष्य) पेश करने की अनुमति दे दी थी, इसलिए अब कोर्ट को उसी आदेश के विपरीत नहीं जाना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 65 के तहत द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति का मतलब यह नहीं है कि बिना स्टाम्प वाले दस्तावेज को साक्ष्य में स्वीकार कर लिया जाए। जब फोटोकॉपी को प्रदर्शित करने की कोशिश की गई, तभी यह आपत्ति सामने आई कि दस्तावेज अपर्याप्त रूप से स्टाम्पित है।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि स्टाम्प ड्यूटी का निर्धारण और दस्तावेज का इम्पाउंडिंग केवल मूल दस्तावेज पर ही संभव है, फोटोकॉपी पर नहीं। चूंकि मूल एग्रीमेंट टू सेल न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं किया गया, इसलिए फोटोकॉपी को इम्पाउंड करने या उस पर कमी की स्टाम्प ड्यूटी तय करने का सवाल ही नहीं उठता।
हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम की धारा 35 के अनुसार अपर्याप्त रूप से स्टाम्पित दस्तावेज साक्ष्य में स्वीकार्य नहीं होता। वहीं, पंजीकरण अधिनियम की धारा 49 का लाभ भी याचिकाकर्ता को नहीं मिल सकता, क्योंकि वह केवल पंजीकरण की बाध्यता से राहत देती है, स्टाम्प ड्यूटी से नहीं।
इन सभी तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने कोई गलती नहीं की है, और याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार की राहत का हकदार नहीं है। परिणामस्वरूप याचिका खारिज कर दी गई।
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