दस्तावेज़ देर से जमा करने पर असिस्टेंट प्रोफेसर पद की उम्मीदवार की याचिका खारिज
इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मप्र लोक सेवा आयोग (MPPSC) की असिस्टेंट प्रोफेसर (बॉटनी) भर्ती से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए एक महिला उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने स्पष्ट कहा कि भर्ती प्रक्रिया में नियम नहीं बदले जा सकते। तय टाइम लाइन का कड़ाई से पालन होना अनिवार्य है। उम्मीदवारों को चाहिए कि वे टाइम लाइन पर नजर रखें। किसी भी उम्मीदवार को व्यक्तिगत आधार पर छूट देना कानूनन संभव नहीं है।
क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर मांग की थी कि विज्ञापन क्रमांक 17/2022 (दिनांक 30.12.2022) के तहत असिस्टेंट प्रोफेसर (बॉटनी) पद हेतु कट-ऑफ डेट के बाद दस्तावेज़ स्वीकार किए जाएं और उसकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाए। याचिकाकर्ता अनुसूचित जनजाति वर्ग से है और उसने SET-2022 उत्तीर्ण किया था। उसने ऑनलाइन आवेदन 12 अप्रैल 2024 को किया, 9 जून 2024 को लिखित परीक्षा दी और 4 अक्टूबर 2024 को जारी परिणाम में उसका नाम प्रोविजनल मेरिट लिस्ट में क्रमांक 353 पर था।
कहां चूक गई उम्मीदवार
परिणाम के साथ जारी निर्देशों में साफ लिखा था कि 25 अक्टूबर 2024 तक दस्तावेज़ जमा नहीं करने पर उम्मीदवारी स्वतः निरस्त हो जाएगी। MPPSC ने दो बार मौका दिया। पहले ₹3,000 और फिर ₹25,000 लेट फीस जमा होना थी इसके बावजूद याचिकाकर्ता दस्तावेज़ जमा नहीं कर सकी। बाद में 25 नवंबर 2024 को उसने बीमारी (Mixed Connective Tissue Disease – MCTD) का हवाला देते हुए आवेदन दिया, जिसे आयोग ने खारिज कर दिया।
याचिकाकर्ता की दलील
MPPSC का पक्ष
हाईकोर्ट का सख्त रुख
हाईकोर्ट ने कहा- उम्मीदवार का दायित्व है कि वह आयोग की वेबसाइट पर नियमित नजर रखे। विज्ञापन और परिणाम निर्देशों में समय-सीमा अनिवार्य थी। बीमारी के आधार पर छूट देने का कोई प्रावधान नियमों में नहीं है। इस स्तर पर हस्तक्षेप करना विज्ञापन की शर्तें बदलने जैसा होगा, जो कानूनन अस्वीकार्य है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक नियुक्तियों में समानता, निश्चितता और अनुशासन आवश्यक है। सहानुभूति के आधार पर छूट देने से भर्ती प्रक्रिया की पवित्रता प्रभावित होगी। कोर्ट ने MPPSC की कार्रवाई को पूरी तरह वैध ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।
क्यों है यह फैसला अहम
यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि भर्ती परीक्षाओं में समय-सीमा सर्वोपरि है। योग्य होने के बावजूद प्रक्रियात्मक लापरवाही भारी पड़ सकती है। अदालतें भर्ती नियमों में ढील देने के पक्ष में नहीं हैं।
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