ग्वालियर हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील मंजूर कर धारा 163-A के तहत 4.09 लाख रुपये का मुआवजा निरस्त किया
ग्वालियर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए बीमा कंपनी द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया है। जस्टिस हिरदेश की अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मुआवजा दावा पेश करने वाले की वार्षिक आय ₹40,000 से अधिक है, तो मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 163-A के तहत उसका मुआवजा दावा पोषणीय (maintainable) नहीं है। यह अपील Third Motor Accident Claims Tribunal, Morena द्वारा पारित अवॉर्ड के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसमें दावाकर्ता को ₹4,09,000/- का मुआवजा 7% वार्षिक ब्याज सहित प्रदान किया गया था।
मामला संक्षेप में
दावाकर्ता हरीश चंद्र सेंगर ने 31 दिसंबर 2005 को हुई सड़क दुर्घटना के संबंध में दावा प्रस्तुत किया था। दुर्घटना उस समय हुई जब वह ट्रक क्रमांक MP07-G-4430 चला रहा था, जो दूसरे ट्रक UP78-AT-4105 से टकरा गया।
दावाकर्ता का कहना था कि उसे गंभीर चोटें आईं, जिससे उसे 50% स्थायी दिव्यांगता हुई।
दावे में उसने अपनी आय ₹4,000/- प्रतिमाह और ₹30/- प्रतिदिन भत्ता बताकर कुल ₹19 लाख के मुआवजे की मांग की थी।
बीमा कंपनी की दलील
बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दावाकर्ता की वार्षिक आय ₹40,000/- से अधिक है, इसलिए धारा 163-A के अंतर्गत दावा नहीं बनता। दिव्यांगता का प्रतिशत बिना ठोस चिकित्सकीय आधार के तय किया गया। इसके अलावा क्लेम ट्रिब्यूनल ने व्यक्तिगत खर्च, सहदोष (contributory negligence) जैसे पहलुओं पर विचार ही नहीं किया।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि स्वयं दावाकर्ता के कथन के अनुसार उसकी वार्षिक आय ₹40,000/- से अधिक थी। ऐसे में धारा 163-A के तहत दावा विधिसंगत नहीं है। क्लेम ट्रिब्यूनल द्वारा पारित अवॉर्ड कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।
अदालत ने यह दोहराया कि धारा 163-A एक विशेष योजना है, जो केवल सीमित आय वर्ग के लिए लागू होती है। अदालत ने बीमा कंपनी की अपील स्वीकार करके 12.12.2008 का एमएसीटी अवॉर्ड निरस्त करके ₹4,09,000/- मुआवजा व ब्याज देने का क्लेम ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया।