LAW'S VERDICT

7 साल तक की सजा के निलंबन पर अदालतें उदारता दिखाएं

 
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, मप्र हाईकोर्ट का आदेश किया निरस्त 

नई दिल्ली  Supreme Court of India ने नकली नोटों से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि सजा निलंबन के मुद्दे पर अदालतों को उदार रुख दिखाना चाहिए।  जस्टिस जेएस पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमे सजा के खिलाफ दाखिल अपील सुनवाई के लिए मंजूर तो की गई थी,  लेकिन सजा निलंबन की अंतरिम अर्जी खारिज कर दी गई थी। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायलय ने साफ कहा कि निश्चित अवधि (fixed term) की सजा वाले मामलों में अपील लंबित रहने के दौरान सजा निलंबन (suspension of sentence) पर उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो।

मामला क्या था?

नकली नोटों के साथ पकडे गए जबलपुर के खमरिया में रहने वाले सुखचैन चक्रवर्ती को सत्र न्यायालय, जबलपुर ने 19  सितम्बर 2024 का दोषी पाते हुए  IPC की धारा 489-A और 489-D के तहत  7 वर्ष के कठोर कारावास और ₹100 जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल हुई। मप्र हाईकोर्ट की मुख्यपीठ में जस्टिस देवनारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने 29 जनवरी 2025 को सजा के खिलाफ सुखचैन की अपील स्वीकार तो की, लेकिन सजा निलंबन की अंतरिम अर्जी खारिज कर दी थी। इस पर यह अपील सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी। 

हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी

आरोपी की और से वरिष्ठ अधिवक्ता एसके गंगेले ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को “नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर” करार दिया। कोर्ट ने कहा- हाईकोर्ट के आदेश को पढ़कर हम पूरी तरह निराश हैं। इस आदेश से यह स्पष्ट नहीं होता कि किस आधार पर सजा निलंबन से हाईकोर्ट ने इनकार किया है। सिंगल बेंच ने स्थापित कानूनी सिद्धांतों का सही अनुप्रयोग नहीं किया।

तय अवधि vs आजीवन कारावास

शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा कि निश्चित अवधि की सजा (जैसे 7 साल) में अपील लंबित रहते सजा निलंबन पर उदारता अपेक्षित की जाती  है। हालाँकिआजीवन कारावास के मामलों में विचार का पैमाना अलग हो सकता है। कोर्ट ने 1999 के फैसले Bhagwan Rama Shinde Gosai बनाम State of Gujarat का हवाला देते हुए कहा कि फिक्स्ड टर्म की सजा में निलंबन सामान्यतः दिया जाना चाहिए।

अंतिम आदेश

शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश रद्द करके अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि जमानत की  शर्तें ट्रायल कोर्ट तय करेगा

क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?

यह निर्णय उन मामलों में नजीर बनेगा जहाँ अपील लंबित है और सजा निश्चित अवधि की है। इस फैसले के जरिए निचली अदालतों और हाईकोर्ट्स को स्पष्ट मार्गदर्शन दिया गया है कि सजा निलंबन पर निर्णय कारणों सहित और कानून के अनुरूप होना चाहिए।

CRIMINAL APPEAL NOs. OF 2026 (@ SLP (CRL.) NOs. /2026) (@ DIARY NO. 69384/2025)

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