Collector को 6 महीने में फैसला करने के निर्देश, महंत योगेश्वर दास ही संभालेंगे मंदिर प्रबंधन
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने नर्मदापुरम जिले के पिपरिया स्थित श्रीदेव रामजानकी मंदिर से जुड़े विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए बिना जांच ट्रस्ट में प्रशासक (रिसीवर) की नियुक्ति को अवैध करार दिया है।
जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि बिना किसी प्रारंभिक जांच या सुनवाई के किसी ट्रस्टी या महंत से अधिकार नहीं छीने जा सकते। अदालत ने कलेक्टर को निर्देश दिए हैं कि मंदिर ट्रस्ट से जुड़े दो लंबित आवेदनों का निराकरण 6 माह के भीतर किया जाए। तब तक महंत योगेश्वर दास ही मंदिर का प्रबंधन संभालते रहेंगे।
क्या है पूरा विवाद?
महंत योगेश्वर दास द्वारा दायर अपील में बताया गया कि पिपरिया के श्रीदेव रामजानकी मंदिर की स्थापना वर्ष 1955 में महंत गोपाल दास ने की थी। मंदिर ट्रस्ट गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित रहा है।
गोपाल दास के बाद महंत सुखराम दास और फिर योगेश्वर दास ने मंदिर का प्रबंधन संभाला।
याचिकाकर्ता का दावा था कि स्वर्गीय सुखराम दास द्वारा 2 अगस्त 2006 को लिखी गई रजिस्टर्ड वसीयत के आधार पर वे ट्रस्ट के सर्वराकार बने और 8 फरवरी 2008 को उनका नाम आधिकारिक रूप से दर्ज हुआ। वर्ष 2008 से वे निष्कलंक रूप से मंदिर का संचालन कर रहे थे।
किराएदार की शिकायत पर हुई कार्रवाई,
मामले में बताया गया कि एक किराएदार की शिकायत के आधार पर पिपरिया के तहसीलदार ने मंदिर ट्रस्ट में प्रशासक (रिसीवर) नियुक्त कर दिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने कलेक्टर के समक्ष दो आवेदन दाखिल किए, जो अभी भी लंबित हैं।
बिना किसी जांच और सुनवाई के की गई इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। सिंगल बेंच से राहत न मिलने पर मामला डिवीजन बेंच के समक्ष अपील में पहुंचा।
हाईकोर्ट का सख्त रुख,
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर, उनके साथ अधिवक्ता सिद्धांत जैन और भूपेश तिवारी ने पक्ष रखा।
मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने एकतरफा और बिना जांच की गई कार्रवाई को अनुचित बताते हुए उसे निरस्त कर दिया।
अदालत की प्रमुख टिप्पणियां
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बिना जांच ट्रस्ट में प्रशासक नियुक्त करना कानूनन गलत
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महंत/ट्रस्टी को हटाने से पहले सुनवाई आवश्यक
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प्रशासन को न्यायसंगत प्रक्रिया अपनानी होगी