LAW'S VERDICT

मां की ममता से बड़ा कोई हक नहीं: पोते की कस्टडी पर दादा-दादी की अपील हाईकोर्ट ने की खारिज


MP High Court Custody Case: 7वीं में पढ़ रहे बेटे को मां से अलग करने का कोई आधार नहीं,

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम कस्टडी मामले में स्पष्ट कहा है कि “मां की ममता से बड़ा कोई अधिकार नहीं होता”। अदालत ने 7वीं कक्षा में पढ़ रहे बच्चे अवध की कस्टडी मां से लेकर दादा-दादी को देने की मांग को खारिज कर दिया।

जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि बच्चे को उसकी मां से अलग करने का कोई ठोस कारण रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि दादा-दादी को वास्तव में पोते के भविष्य की चिंता है, तो वे उसकी आर्थिक मदद कर सकते हैं, जिसे मां अस्वीकार नहीं करेगी।

क्या है पूरा मामला?

यह अपील सागर निवासी नाथूराम और ताराबाई द्वारा दायर की गई थी। उनके बेटे अरविंद की शादी विनिता से हुई थी, जिनसे उन्हें पुत्र अवध हुआ। अरविंद की मृत्यु के बाद विनिता ने दूसरी शादी कर ली और अपने बेटे अवध को अपने साथ ले गईं।

दादा-दादी का तर्क था कि विनिता और उसके दूसरे पति के साथ अवध का भविष्य सुरक्षित नहीं है, इसलिए उन्होंने भोपाल की फैमिली कोर्ट में कस्टडी के लिए आवेदन दिया था।
31 जुलाई 2025 को फैमिली कोर्ट द्वारा आवेदन खारिज किए जाने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां अपील को भी खारिज कर दिया गया।

बच्चे की राय को मिला महत्व

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि अवध के बयान दर्ज किए गए थे।
अवध ने साफ शब्दों में कहा:

“मेरी मां मुझे अच्छे से रखती है। अगर मुझे दादा-दादी के पास भेजा गया तो मैं उनके साथ नहीं रहूंगा। मैंने उन्हें बचपन से नहीं देखा। मैं अपनी मां के साथ ही रहना चाहता हूं।”

अदालत ने बच्चे की इच्छा और भावनात्मक सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश

  • मां ही बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक है

  • केवल आशंका के आधार पर कस्टडी नहीं बदली जा सकती

  • बच्चे की राय और भलाई सबसे महत्वपूर्ण


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