LAW'S VERDICT

दिव्यांग अधिवक्ताओं को बड़ी राहत: बार काउंसिल चुनाव में सिर्फ 15 हजार लगेगा नामांकन शुल्क

 

नई दिल्ली |  Supreme Court of India ने बार काउंसिल चुनावों को लेकर दिव्यांग (Specially Abled) अधिवक्ताओं के पक्ष में एक अहम आदेश पारित किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आगामी State Bar Council Elections में दिव्यांग अधिवक्ताओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाएगा और उनके लिए नामांकन शुल्क में बड़ी छूट लागू होगी। बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया ने कहा है कि  दिव्यांग अधिवक्ताओं को  सिर्फ 15 हजार का नामांकन शुल्क देना पड़ेगा ।  इस बयान पर प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की डिवीज़न बेंच ने पंकज सिन्हा की और से दाखिल याचिका के निराकरण कर दिया । 

कोर्ट के समक्ष उठे दो अहम मुद्दे

सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने दो मुख्य प्रश्न आए—

  1. राज्य बार काउंसिलों के चुनावों में दिव्यांग अधिवक्ताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व कैसे सुनिश्चित किया जाए?

  2. दिव्यांग अधिवक्ताओं द्वारा चुकाए जाने वाले ₹1,25,000 के नामांकन शुल्क का क्या होगा?

बार काउंसिल ऑफ इंडिया का पक्ष

Bar Council of India के अध्यक्ष व वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने कोर्ट को बताया कि चूंकि अधिकांश राज्यों में चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, इसलिए दिव्यांग अधिवक्ताओं को विभिन्न समितियों में को-ऑप्शन (Co-option) के जरिए प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। यदि कोई दिव्यांग अधिवक्ता चुनाव लड़ना चाहता है, तो उसे अब ₹1,25,000 की जगह केवल ₹15,000 का प्रतीकात्मक नामांकन शुल्क देना होगा।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जय सिंह  ने यह महत्वपूर्ण सुझाव दिया कि यह रियायत केवल दिव्यांग अधिवक्ताओं तक सीमित रहे, ताकि अन्य श्रेणियों के प्रत्याशी समानता (Parity) का दावा न कर सकें।
कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए आदेश पारित किया।

महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण 

को-ऑप्शन के जरिए नामांकन, दिव्यांग अधिवक्ताओं के चुनाव लड़ने के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा। यह व्यवस्था अस्थायी और अतिरिक्त (without prejudice) होगी।

भविष्य के लिए बड़ा निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य के बार काउंसिल चुनावों में दिव्यांग अधिवक्ताओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए संबंधित नियमों/कानूनों में संशोधन प्रक्रिया शुरू की जाए। आवश्यकता पड़ने पर कानूनी प्रावधानों में संशोधन भी किया जाए। नामांकन और नामसूची (Enrolment) शुल्क में संशोधन के लिए उपयुक्त प्राधिकरण से संपर्क किया जा सकता है।

हाईकोर्ट्स को स्पष्ट निर्देश

सुनवाई के बाद दिए फैसले में कोर्ट ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही महिला अधिवक्ताओं और दिव्यांग अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व को लेकर हस्तक्षेप कर चुका है और राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर हाई-पावर्ड इलेक्शन कमेटियां गठित हो चुकी हैं, तब हाईकोर्ट्स को इस विषय पर नई याचिकाएं स्वीकार नहीं करनी चाहिए, खासकर तब जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो।

क्यों अहम है यह फैसला

यह आदेश न सिर्फ दिव्यांग अधिवक्ताओं को आर्थिक राहत देता है, बल्कि संस्थागत प्रतिनिधित्व की दिशा में भी एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे बार काउंसिल जैसी संवैधानिक संस्थाओं में समावेशिता (Inclusivity) को मजबूती मिलेगी।

Writ Petition(s)(Civil) No(s).1261/2025

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