नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार दोहराया गया सिद्धांत— “ज़मानत नियम है, जेल अपवाद”—एक बार फिर न्यायिक बहस के केंद्र में है। अदालत ने साफ कहा कि विचाराधीन कैद को सज़ा का रूप नहीं दिया जा सकता।
इस फैसले का विश्लेषण बताता है कि समस्या कानून में नहीं, बल्कि उसके अमल में है। निचली अदालतें अक्सर गंभीर अपराध के नाम पर ज़मानत याचिकाएं यांत्रिक रूप से खारिज कर देती हैं, जिससे जेलों में भीड़ बढ़ती है।
यदि इस निर्णय की भावना को ज़मीन पर लागू किया गया, तो यह आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़ा सुधार साबित हो सकता है।
Tags
Judgment-Analysis
