15 मीटर रोड चौड़ीकरण के लिए शाही मस्जिद का हिस्सा हटाने की कार्रवाई में दखल से किया इनकार
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।
उज्जैन में शाही मस्जिद के हिस्से को 15 मीटर सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाने के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। मस्जिद से जुड़े दो अलग-अलग पक्षों की ओर से दायर याचिकाओं को जस्टिस संदीप एन भट्ट की कोर्ट ने खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने नगर निगम की ओर से जारी नोटिसों को चुनौती देते हुए मस्जिद के हिस्से को तोड़े जाने पर रोक लगाने की मांग की थी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नगर निगम की कार्रवाई को मनमानी, भेदभावपूर्ण या संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-A का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। कोर्ट के मुताबिक सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई से पहले संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया गया और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया।
जस्टिस की डिवीजन बेंच ने यह भी माना कि सिंहस्थ कुंभ 2028 के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की संभावित भीड़, ट्रैफिक प्रबंधन और व्यापक जनहित को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण महत्वपूर्ण है।
क्या है पूरा मामला?
उज्जैन की शाही मस्जिद, नगर निगम नंबर 524, खसरा नंबर 2072, छत्री चौक से संबंधित दो याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे धार्मिक स्थल के संचालन और प्रबंधन से जुड़े हैं तथा मस्जिद वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत है। उनका कहना था कि यह प्राचीन धार्मिक संरचना है, जो कई पीढ़ियों से अस्तित्व में है। नगर निगम द्वारा 15 मीटर सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद के कुछ हिस्से को हटाने के नोटिस जारी किए गए थे। याचिकाकर्ताओं ने इन नोटिसों और अंतिम आदेश को चुनौती देते हुए कार्रवाई रोकने की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं ने कहा- मस्जिद का अहम हिस्सा प्रभावित होगा
याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि प्रस्तावित सड़क लाइन लागू होने पर मस्जिद के जमातखाना यानी प्रार्थना कक्ष, वजू की सुविधा, 120 फीट ऊंची मीनार और सामने स्थित मजहर चौक शाही का हिस्सा प्रभावित होगा। उनकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि धार्मिक स्थल को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त है। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि आसपास की कुछ अन्य संपत्तियों को नहीं हटाया जा रहा है और वैकल्पिक रूप से सड़क चौड़ीकरण के लिए दूसरी जमीन का इस्तेमाल किया जा सकता है। दलीलों के समर्थन में गुजरात हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला भी दिया गया।
नगर निगम ने कोर्ट में क्या बताया?
नगर निगम की ओर से अधिवक्ता ऋषि तिवारी ने अदालत को बताया कि इंदौर डेवलपमेंट प्लान-2035 के लिए धारा 305 के तहत नोटिस जारी किया गया था। संबंधित सड़क पर पहले ही 10 मंदिरों और 1 मस्जिद के निर्माण के हिस्से हटाए जा चुके हैं। इसके अलावा उज्जैन शहर में करीब 80 धार्मिक स्थलों के निर्माण के संबंध में कार्रवाई किए जाने की जानकारी भी रिकॉर्ड पर रखी गई।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि यह कहना उचित नहीं है कि नगर निगम केवल याचिकाकर्ताओं के धार्मिक स्थल को निशाना बनाकर मनमानी या भेदभावपूर्ण कार्रवाई कर रहा है।
हाईकोर्ट ने माना- सुनवाई का मौका दिया गया
हाईकोर्ट ने मामले की घटनाक्रमवार स्थिति पर विचार करते हुए कहा कि मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियों को सुनवाई का अवसर दिया गया था। कोर्ट ने माना कि आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही संबंधित आदेश पारित किया गया। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होने की दलील भी स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट के अनुसार 15 मीटर सड़क चौड़ीकरण व्यापक जनहित में किया जा रहा विकास कार्य है और मौजूदा परिस्थितियों में मस्जिद की संपत्ति का एक छोटा हिस्सा सड़क चौड़ीकरण में बाधा बन रहा है।
वैकल्पिक रास्ते का सुझाव भी हाईकोर्ट ने नहीं माना
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क भी दिया गया था कि सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद के बजाय गार्डन या सामने स्थित व्यावसायिक संपत्ति की जमीन का इस्तेमाल किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा सड़क और आवश्यक विस्तार की स्थिति को देखते हुए वैकल्पिक तरीके से सड़क चौड़ीकरण करने की गुंजाइश नहीं है।
सिंहस्थ कुंभ 2028 का भी कोर्ट ने लिया संज्ञान
फैसले में हाईकोर्ट ने सिंहस्थ कुंभ 2028 को भी महत्वपूर्ण पहलू माना। कोर्ट ने कहा कि आगामी सिंहस्थ में करोड़ों श्रद्धालुओं की अपेक्षाओं को ध्यान में रखना होगा। साथ ही ऐसे बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान बेहतर सुविधाएं, ट्रैफिक प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित परिसर महाकालेश्वर मंदिर के लगभग सामने और क्षिप्रा नदी के काफी नजदीक स्थित है। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि व्यापक जनहित और सार्वजनिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने कहा- याचिकाएं मेरिटलेस
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में कई विवादित तथ्य और याचिकाकर्ताओं के लोकस स्टैंडी (याचिका दाखिल करने के अधिकार) से जुड़े प्रश्न मौजूद हैं। ऐसे मामलों में अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करना उचित नहीं है, खासकर जब मामला व्यापक जनहित से जुड़ा हो। अंततः हाईकोर्ट ने माना कि नगर निगम और राज्य की कार्रवाई मनमानी, अन्यायपूर्ण, असंवैधानिक या अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-A का उल्लंघन करने वाली नहीं है। कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को मेरिट से रहित मानते हुए खारिज कर दिया।
