LAW'S VERDICT

‘मनमाने नियम बनाकर शिक्षकों को अधिकार से वंचित नहीं कर सकती सरकार’: MP हाईकोर्ट

मप्र सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग की रिव्यू पिटीशन हुई खारिज 

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर। 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शिक्षकों को B.Ed.-D.Ed. योग्यता हासिल करने पर मिलने वाली दो अग्रिम वेतनवृद्धि (Advance Increment) के मामले में राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने कहा कि एक ही वर्ग के कर्मचारियों के बीच बिना किसी ठोस आधार और उद्देश्य के मनमाने तरीके से कट-ऑफ डेट तय कर उप-वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार केवल सर्कुलर जारी करके ऐसे कर्मचारियों को उनके वैधानिक लाभ से वंचित नहीं कर सकती, जो मूल नियमों के तहत समान वर्ग में आते हैं।

पन्ना के दो शिक्षकों को दो इन्क्रीमेंट का मामला

मामला पन्ना जिले के शिक्षक सुमेर सिंह और भान सिंह से जुड़ा है। दोनों शिक्षकों ने B.Ed.-D.Ed. की योग्यता हासिल की थी। हाईकोर्ट ने इससे पहले 16 जून 2025 को दोनों शिक्षकों को संबंधित योग्यता पूरी करने पर दो वेतनवृद्धि देने का आदेश दिया था। इस आदेश से असंतुष्ट राज्य सरकार ने पुनर्विचार याचिका दाखिल की।

सरकार ने 1 मार्च 1999 की कट-ऑफ डेट का दिया हवाला

राज्य सरकार की ओर से रिव्यू पिटीशन में दलील दी गई कि दोनों शिक्षकों ने आवश्यक शैक्षणिक योग्यता 1 मार्च 1999 के बाद हासिल की थी। इसलिए सरकार के अनुसार वे दो अग्रिम वेतनवृद्धि के लाभ के पात्र नहीं थे। सरकार ने इसी आधार पर 16 जून 2025 के हाईकोर्ट के आदेश पर पुनर्विचार की मांग की थी।

मूल नियम में 16 जून 1993 की तारीख महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने मामले में लागू नियमों और बाद में जारी सर्कुलर की जांच की। कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि मूल नियम के अनुसार 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस लाभ का पात्र माना गया था। इसके पीछे कारण यह था कि 16 जून 1993 के बाद संबंधित शैक्षणिक योग्यता शिक्षक भर्ती के लिए अनिवार्य कर दी गई थी। इसके बाद राज्य सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर अतिरिक्त शर्त जोड़ दी कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त शिक्षक तभी अग्रिम वेतनवृद्धि के पात्र होंगे, जब उन्होंने B.Ed.-D.Ed. की योग्यता 1 मार्च 1999 से पहले हासिल की हो।

हाईकोर्ट- एक ही वर्ग में अलग-अलग नियम नहीं बना सकती सरकार

जस्टिस विवेक जैन ने कहा कि 16 जून 1993 से पहले नियुक्त सभी शिक्षक एक ही वर्ग में आते हैं। ऐसे में इस वर्ग के भीतर बिना किसी उचित आधार, तर्क या उद्देश्य के अलग-अलग उप-वर्ग बनाकर कुछ शिक्षकों को लाभ देना और कुछ को उससे वंचित करना उचित नहीं है। अदालत ने माना कि सरकार द्वारा बाद में जोड़ी गई 1 मार्च 1999 की कट-ऑफ डेट के आधार पर शिक्षकों के बीच ऐसा भेद किया गया, जिसका कोई ठोस औचित्य सामने नहीं आया।

मनमाने कट-ऑफ से अधिकार नहीं छीना जा सकता

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक सर्कुलर या मनमाना वर्गीकरण किसी कर्मचारी के वैध अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता। यदि कर्मचारी मूल नियमों के तहत एक समान श्रेणी में आते हैं, तो उनके बीच भेदभाव करने के लिए युक्तिसंगत और उद्देश्यपूर्ण आधार होना आवश्यक है।

सरकार की रिव्यू पिटीशन खारिज

अदालत ने पुनर्विचार के लिए कोई ठोस आधार नहीं पाया। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से दाखिल Review Petition को खारिज कर दिया गया और 16 जून 2025 के मूल आदेश को बरकरार रखा। शिक्षकों की ओर से अधिवक्ता सुभाष कुमार चतुर्वेदी ने पैरवी की।

शिक्षकों के वेतन लाभ पर महत्वपूर्ण फैसला

हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के सेवा लाभ से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। फैसले का मूल सिद्धांत यह है कि समान परिस्थिति वाले कर्मचारियों के बीच मनमाने तरीके से कट-ऑफ डेट लगाकर भेदभाव नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब ऐसा वर्गीकरण किसी तार्किक और वैध उद्देश्य पर आधारित न हो।



हाईकोर्ट का आदेश देखें         RP-1001-2026

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