ग्वालियर हाईकोर्ट का विदिशा के शासकीय एसएसएल जैन कॉलेज के पूर्व प्राचार्य की याचिका पर बड़ा फैसला
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, ग्वालियर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी सहायता प्राप्त (Aided) गैर-सरकारी कॉलेज के कर्मचारी को केवल राज्य सरकार से पेंशन मिलने के आधार पर न तो सरकारी कर्मचारी मन जा सकता और न ही उसे चार्जशीट जारी की जा सकती है। ऐसे कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने का अधिकार उसी प्राधिकरण को होगा, जो संबंधित सेवा नियमों के तहत सक्षम है। जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की सिंगल बेंच ने शासकीय एसएसएल जैन कॉलेज, विदिशा के पूर्व प्राचार्य के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा जारी 11 सितंबर 2017 की चार्जशीट रद्द कर दी है। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कानून के अनुसार सक्षम प्राधिकरण के पास कार्रवाई का अधिकार है, तो वह नियमानुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है।
याचिकाकर्ता डॉ. अरविन्द कुमार गंगेले विदिशा के शासकीय एसएसएल जैन कॉलेज में प्राचार्य के पद पर कार्यरत थे। यह एक सहायता प्राप्त संस्था थी। उनकी नियुक्ति कॉलेज की Governing Body द्वारा की गई थी। बाद में राज्य सरकार ने उनके खिलाफ 11 सितंबर 2017 को चार्जशीट जारी की। आरोप था कि कॉलेज में कार्यकाल के दौरान एक कर्मचारी के बकाया भुगतान में देरी हुई, जिसके कारण सरकार को करीब ₹18.46 लाख ब्याज के रूप में देना पड़ा। पूर्व प्राचार्य ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस चार्जशीट को चुनौती दी।
गवर्निंग बॉडी ही कर सकती थी कार्रवाई
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी और अधिवक्ता मो. आमिर खान की दलील थी कि उनकी नियुक्ति राज्य सरकार ने नहीं, बल्कि कॉलेज की Governing Body ने की थी। इसलिए सेवा नियमों के अनुसार Governing Body ही उनकी नियुक्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए सक्षम प्राधिकरण थी। उन्होंने यह भी कहा कि वे 30 अप्रैल 2011 को 62 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो गए थे। बाद में हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण वे 30 अप्रैल 2014 तक सेवा में रहे। याचिकाकर्ता का तर्क था कि सेवानिवृत्ति के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार M.P. Civil Services (Pension) Rules, 1976 की Rule 9 का सहारा नहीं ले सकती, क्योंकि वे सरकारी कर्मचारी थे ही नहीं।
भुगतान में देरी के आरोप को भी चुनौती दी
याचिकाकर्ता ने कहा कि जिस भुगतान में देरी का आरोप लगाया गया है, उस मामले में राज्य सरकार ने खुद अदालत में अपील और बाद में सुप्रीम कोर्ट में Special Leave Petition दाखिल की थी। उनका कहना था कि जब मामला अदालत में चल रहा था, तब उनके पास भुगतान जारी करने का स्वतंत्र अधिकार नहीं था। इसलिए देरी के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर विस्तार से फैसला नहीं दिया, क्योंकि कोर्ट ने सबसे पहले यह तय किया कि राज्य सरकार के पास चार्जशीट जारी करने का अधिकार ही था या नहीं।
सरकार ने कहा- हो सकती है कार्रवाई
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता को राज्य सरकार की पेंशन योजना के तहत पेंशन मिल रही थी। इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद उनके खिलाफ Rule 9 के तहत विभागीय कार्रवाई शुरू की जा सकती है। सरकार ने यह भी कहा कि कॉलेज को Government Grant-in-Aid मिलता है और याचिकाकर्ता के कथित कृत्य के कारण सरकार पर आर्थिक भार पड़ा। इसलिए राज्य सरकार को कार्रवाई करने का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने ठुकराई सरकार की दलील
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि Rule 9 अपने आप किसी व्यक्ति को सरकारी कर्मचारी नहीं बनाता और न ही राज्य सरकार को हर ऐसे व्यक्ति के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का अधिकार देता है। इसके लिए पहले यह देखना जरूरी है कि संबंधित कर्मचारी वास्तव में 1976 के Pension Rules के तहत सरकारी कर्मचारी है या नहीं। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में याचिकाकर्ता की नियुक्ति राज्य सरकार ने नहीं की थी। उनकी नियुक्ति कॉलेज की Governing Body ने की थी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज भी नहीं था, जिससे यह साबित हो कि वे राज्य सरकार की Civil Service के सदस्य थे या राज्य सरकार के अधीन किसी Civil Post पर नियुक्त थे।
पेंशन मिलने से कर्मचारी, सरकारी नहीं बन जाता
हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पेंशन मिलने और सरकारी कर्मचारी होने की स्थिति दो अलग-अलग बातें हैं। किसी कर्मचारी को राज्य सरकार की सहायता से पेंशन मिल सकती है, लेकिन इससे वह अपने आप सरकारी कर्मचारी नहीं बन जाता। इसी तरह किसी कॉलेज को सरकार से Grant-in-Aid मिलने का मतलब यह नहीं है कि कॉलेज के कर्मचारियों का वास्तविक employer राज्य सरकार बन जाएगी। जब तक कोई स्पष्ट वैधानिक प्रावधान राज्य सरकार को नियुक्ति और अनुशासनात्मक अधिकार नहीं देता, तब तक केवल आर्थिक सहायता या पेंशन योजना के आधार पर राज्य सरकार को disciplinary authority नहीं माना जा सकता।
₹18.46 लाख के ब्याज से भी अधिकार नहीं मिला
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि भले ही कथित देरी के कारण सरकार को ₹18,46,940 का ब्याज देना पड़ा हो, लेकिन इससे राज्य सरकार को कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने कहा कि disciplinary jurisdiction इस बात से तय नहीं होती कि कथित गलती के कारण आर्थिक नुकसान किसे हुआ। यह अधिकार कर्मचारी और उसके employer के बीच लागू सेवा नियमों से तय होता है।
हाईकोर्ट ने चार्जशीट की रद्द
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 11 सितंबर 2017 को जारी चार्जशीट को jurisdiction के अभाव में रद्द कर दिया। कोर्ट ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि पूर्व प्राचार्य के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई हमेशा के लिए समाप्त हो गई है। यदि संबंधित सेवा नियमों के तहत कोई सक्षम प्राधिकरण कानूनी रूप से कार्रवाई करने के लिए अधिकृत है, तो वह कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है।
