LAW'S VERDICT

सिंगरौली पुलिस की जांच पर HC का गंभीर सवाल: 6 फीट ऊंची खिड़की, 4 फीट की रस्सी... 5 फीट 5 इंच की छात्रा ने कैसे लगाई फांसी?

छात्रा की मौत के मामले में डीजीपी और एसपी को विभागीय कार्रवाई के आदेश, 30 दिन में एक्शन टेकन रिपोर्ट तलब 

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सिंगरौली की एक छात्रा की संदिग्ध मौत को बिना पर्याप्त जांच के आत्महत्या करार देने पर मोरवा थाना पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस हिमान्शु जोशी की एकलपीठ ने मामले की जांच को प्रथम दृष्टया दोषपूर्ण और आरोपियों को बचाने वाली बताते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP) और सिंगरौली के पुलिस अधीक्षक (SP) को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने 30 दिनों के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) पेश करने का आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि वह स्वयं इस मामले की निगरानी करेगी। अगली सुनवाई 26 अगस्त को होगी।

बहन ने उठाये थे पुलिस जांच पर सवाल 

मामला सिंगरौली निवासी दीपांजलि पनिका द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका के अनुसार, 22 जून 2025 को उसकी बहन का शव भगत सिंह कॉलोनी स्थित मकान में संदिग्ध परिस्थितियों में मिला था। मृतका के शरीर पर कई गंभीर चोटों के निशान, खरोंचें और गले पर कसाव (लिगेचर) के गहरे निशान मौजूद थे। इसके बावजूद पुलिस ने शुरुआती जांच में ही इसे आत्महत्या का मामला मान लिया। याचिकाकर्ता ने पुलिस की जांच को पक्षपातपूर्ण बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। पिछली पेशी पर अदालत ने मोरवा थाना प्रभारी और जांच अधिकारी को तालाब किया था। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंकित सक्सेना ने पैरवी की। 

हाईकोर्ट ने आत्महत्या की थ्योरी पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने घटनास्थल की परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए पाया कि पुलिस की आत्महत्या वाली थ्योरी वैज्ञानिक और तार्किक कसौटी पर टिकती नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जिस खिड़की से फांसी लगाने का दावा किया गया, उसकी ऊंचाई लगभग 6 फीट 10 इंच थी, जबकि रस्सी का सिरा जमीन से मात्र 4 फीट 10 इंच की ऊंचाई पर था। मृतका की लंबाई 5 फीट 5 इंच थी। ऐसे में यह समझ से परे है कि वह उस स्थिति में फांसी कैसे लगा सकती थी।

जांच में हाईकोर्ट को मिलीं कई गंभीर खामियां

हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में कई गंभीर विसंगतियों की ओर इशारा किया।

  • मृतका के शरीर पर स्पष्ट चोटों के निशान होने के बावजूद पुलिस द्वारा तैयार पंचनामा में चोटों का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर चोटों की पुष्टि हुई।
  • शव 22 जून को मिलने के बावजूद पोस्टमार्टम 24 जून को कराया गया, जिससे महत्वपूर्ण फॉरेंसिक साक्ष्य प्रभावित हुए।
  • 24 जून को सुरक्षित किए गए विसरा नमूनों को लगभग एक महीने बाद 28 जुलाई को फॉरेंसिक साइंस लैब भेजा गया। पुलिस ने कानून-व्यवस्था की ड्यूटी का हवाला दिया, लेकिन अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।
  • घटनास्थल के माप और उपलब्ध भौतिक साक्ष्य पुलिस की आत्महत्या वाली कहानी से मेल नहीं खाते।

मानवाधिकार आयोग ने भी पुलिस की थ्योरी पर उठाए थे सवाल

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि मानवाधिकार आयोग ने भी पुलिस की आत्महत्या वाली थ्योरी को स्वीकार नहीं किया था। आयोग ने मामले में बलात्कार और हत्या की आशंका जताते हुए स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की अनुशंसा की थी। आयोग ने इस मामले की जांच सीबीआई (CBI) या विशेष जांच दल (SIT) से कराने की सिफारिश की थी।

CBI जांच से इनकार, बताई यह वजह

अदालत ने कहा कि चूंकि मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और ट्रायल अग्रिम चरण में है, इसलिए इस समय जांच को सीबीआई को सौंपना या डी-नोवो (De Novo) जांच का आदेश देना न्यायहित में नहीं होगा। ऐसा करने से मुकदमे में अनावश्यक और अत्यधिक देरी होगी।

हाईकोर्ट के अहम निर्देश

1. हत्या और रेप की धाराएं जोड़ने की मांग कर सकेगी पीड़िता

हाईकोर्ट ने पीड़िता पक्ष को यह स्वतंत्रता दी है कि वह ट्रायल कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत कर धारा 216 CrPC (अब लागू समकक्ष प्रावधान) के तहत आरोपों में संशोधन (Alteration of Charges) की मांग कर सकती है। यदि उपलब्ध साक्ष्य उचित पाए जाते हैं तो अदालत हत्या और बलात्कार जैसी गंभीर धाराएं जोड़ने पर विचार कर सकती है।

2. डॉक्टरों और फोरेंसिक विशेषज्ञों की पहले होगी गवाही

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह अधिकार दिया कि वह आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टरों और फोरेंसिक विशेषज्ञों का आउट-ऑफ-टर्न परीक्षण कर उनके बयान समय से पहले दर्ज कर सकती है, ताकि वैज्ञानिक साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन हो सके।

3. एसपी को केस रिकॉर्ड की समीक्षा के निर्देश

अदालत ने सिंगरौली पुलिस अधीक्षक (SP) को पूरे केस रिकॉर्ड की स्वयं समीक्षा करने का निर्देश दिया है। यदि समीक्षा के दौरान यह प्रतीत होता है कि जांच के दौरान महत्वपूर्ण साक्ष्य छिपाए गए हैं या पर्याप्त जांच नहीं हुई है, तो एसपी निचली अदालत में Further Investigation (पूरक जांच) के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

30 दिन में रिपोर्ट, 26 अगस्त को अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने डीजीपी और सिंगरौली एसपी को संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई कर 30 दिनों के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस पूरे मामले की न्यायिक निगरानी जारी रखेगी और 26 अगस्त को अगली सुनवाई के दौरान पुलिस विभाग से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।


हाईकोर्ट का आदेश देखें      WP-25328-2026

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