क्रिमिनल कोर्ट से बरी होने का नहीं मिला फायदा, हाईकोर्ट ने कहा- अनुशासित बल से ऐसी हरकत अस्वीकार्य
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने चाकू की नोक पर महिला से अभद्रता करने वाले एक आरक्षक को बड़ा झटका देते हुए उसकी नौकरी में बहाली की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले अनुशासित पुलिस बल के सदस्य से ऐसी शर्मनाक हरकत की बिल्कुल उम्मीद नहीं की जा सकती। केवल आपराधिक मामले में बरी हो जाने से विभागीय कार्रवाई स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
ऑटो में महिला को चाकू दिखाकर हटवाया था स्कार्फ
मामला रीवा का है। पुलिस लाइन में पदस्थ आरक्षक रामफल अहिरवार पर आरोप था कि 10 जून 2017 को ऑटो में सफर कर रही एक युवती ने स्कार्फ हटाने से इनकार किया तो उसने चाकू दिखाकर उसे डराया और अभद्रता की।
घटना के बाद सिविल लाइंस थाना में एफआईआर दर्ज हुई। विभागीय जांच में आरोप सही पाए जाने पर 6 जून 2018 को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, रीवा ने आरक्षक को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
क्रिमिनल कोर्ट से बरी, फिर भी नहीं मिली नौकरी
बाद में आपराधिक न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इसी आदेश के आधार पर आरक्षक ने वर्ष 2019 में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सेवा में पुनर्बहाली की मांग की। राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता ऋत्विक पराशर ने पैरवी की।
हाईकोर्ट ने कहा- विभागीय जांच अलग, अपराध का ट्रायल अलग
जस्टिस दीपक खोत की एकलपीठ ने कहा कि आपराधिक न्यायालय से बरी होने मात्र से विभागीय जांच में सिद्ध गंभीर आरोप समाप्त नहीं हो जाते।
अदालत ने माना कि विभागीय जांच के दौरान पीड़िता के बयान और अन्य साक्ष्यों से आरक्षक का अनुचित आचरण स्पष्ट रूप से साबित हुआ था।
'ऐसी शर्मनाक हरकत पुलिसकर्मी से स्वीकार नहीं'
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस बल एक अनुशासित सेवा है और उसके सदस्य से कानून का पालन कराने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में महिला के साथ चाकू की नोक पर अभद्र व्यवहार जैसा आचरण अत्यंत गंभीर है और इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षक की याचिका खारिज करते हुए बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-12425-2019
