चित्रकूट यूनिवर्सिटी की पूर्व महिला रजिस्ट्रार को हिरासत में लेने का मामला, पुलिस कार्रवाई पर फिर उठे सवाल
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट की पूर्व महिला रजिस्ट्रार नीरजा नामदेव को कस्टडी में लेने के मामले में सुनवाई के दौरान नया मोड़ आ गया। मामले में अब पुलिस अधिकारियों के बीच जिम्मेदारी को लेकर विरोधाभासी बयान सामने आए हैं।
जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने पूरे घटनाक्रम को गंभीर मानते हुए बुधवार को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
पहले SI बोली- SDOP के निर्देश पर लिया था कस्टडी में
मामला उस समय चर्चा में आया जब हाईकोर्ट के जमानती वारंट की आड़ में पूर्व रजिस्ट्रार को कथित तौर पर अपराधी की तरह हिरासत में लेकर अदालत में पेश किया गया।
6 मई की सुनवाई के दौरान सब-इंस्पेक्टर नेहा सिंह ठाकुर ने अदालत में कहा था कि उन्होंने यह कार्रवाई एसडीओपी चित्रकूट के निर्देश पर की थी। इसके बाद अदालत ने एसडीओपी राजेश सिंह बंजारे को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए थे।
SDOP ने शपथपत्र में मांगी माफी, कहा- SI को हुई गलतफहमी
बाद की सुनवाई में एसडीओपी राजेश सिंह बंजारे अदालत में उपस्थित हुए और अपनी सफाई पेश की। कोर्ट ने उनसे शपथपत्र के माध्यम से जवाब दाखिल करने को कहा था।
बुधवार को हुई सुनवाई में एसडीओपी ने शपथपत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि सब-इंस्पेक्टर ने उनके निर्देशों को गलत तरीके से समझ लिया था। उन्होंने अपने जवाब में माफी भी मांगी।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, डॉ. प्रमिला सिंह द्वारा दायर अवमानना याचिका में हाईकोर्ट ने 27 अप्रैल 2026 को पूर्व रजिस्ट्रार नीरजा नामदेव की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 25 हजार रुपये का जमानती वारंट जारी किया था।
आरोप है कि पुलिस ने इसी वारंट का आधार बनाकर पूर्व रजिस्ट्रार को हिरासत में लिया और उन्हें अपराधी की तरह कोर्ट में पेश किया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर लिया शपथ पत्र
सुनवाई के दौरान पूर्व रजिस्ट्रार की ओर से अधिवक्ता पारितोष गुप्ता उपस्थित हुए। अदालत ने एसडीओपी का शपथपत्र रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
यह मामला अब पुलिस कार्रवाई की वैधता, जमानती वारंट के दायरे और महिला अधिकारी के साथ व्यवहार को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस का केंद्र बन गया है।
