LAW'S VERDICT

पति की हत्या के आरोप में हुई उम्रकैद, 12 साल सजा काटने के बाद पत्नी को मिला इन्साफ

हाईकोर्ट ने  कहा- ‘सिर्फ शक के आधार पर नहीं हो सकती उम्रकैद’ 

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि केवल संदेह (Suspicion) के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। पति की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रही महिला को जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने ठोस सबूतों के अभाव में बरी (Acquitted) कर दिया। साथ ही महिला की तत्काल रिहाई के आदेश दिए गए।

(Singrauli Murder Case 2014)

यह मामला मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के बैढ़न क्षेत्र का है। 2 सितंबर 2014 को अजय नामक युवक की संदिग्ध परिस्थितियों में लाश मिली थी। पुलिस ने उसकी पत्नी पूजा पर हत्या का आरोप लगाया। पुलिस का आरोप था कि अवैध संबंधों के चलते उसने दो किशोरों के साथ मिलकर हत्या कराई। निचली अदालत ने 5 नवंबर 2015 को फैसला सुनाते हुए पूजा को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट का फैसला: ‘No Evidence- No Conviction’

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने लगभग 10 साल पुरानी अपील पर सुनवाई करते हुए कहा:

  • मामले में न कोई प्रत्यक्ष गवाह (Eyewitness) था।
  • न ही कोई पुख्ता भौतिक साक्ष्य (Concrete Evidence)
  • केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) के आधार पर सजा दी गई।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
“सिर्फ शक, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, कानूनी सबूत का स्थान नहीं ले सकता।”

निचली अदालत की बड़ी खामियां उजागर 

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए:

1. हत्या का हथियार ही पेश नहीं हुआ

  • पुलिस ने जिस चाकू को हत्या का हथियार बताया
  • वह अदालत में प्रस्तुत ही नहीं किया गया
  • न ही वह आरोपी से बरामद हुआ

ऐसे में हत्या उसी चाकू से हुई, यह मानना कानूनी रूप से गलत है।  

2. एफएसएल रिपोर्ट पर संदेह

  • ट्रायल कोर्ट ने कहा कि चाकू और कपड़ों पर खून मिला है।
  • एफएसएल (Forensic Science Laboratory) रिपोर्ट रिकॉर्ड पर ही नहीं थी।
  • उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रिपोर्ट में इंसानी खून की पुष्टि भी नहीं हुई थी।

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने इसे गंभीर प्रक्रिया त्रुटि माना।

3. ‘लास्ट सीन थ्योरी’ लागू नहीं

हाईकोर्ट ने कहा मृतक सुबह काम पर गया था। घटना दोपहर की बताई गई। ऐसे में पत्नी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह बताए कि बाहर क्या हुआ।

ऐसे में ‘Last Seen Theory’ इस केस में लागू नहीं होती।

कानूनी सिद्धांत: शक बनाम सबूत

इस फैसले में कोर्ट ने दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों को दोहराया:

  • संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) आरोपी को मिलता है। 
  • परिस्थितिजन्य साक्ष्य तभी मान्य हैं जब वे पूरी तरह से दोष सिद्ध करें। 

अधूरी कड़ियों (Incomplete Chain of Evidence) के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती


हाईकोर्ट का आदेश देखें    CRA-223-2016

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