LAW'S VERDICT

आरटीआई पर सरकार को झटका: हाईकोर्ट ने कहा—“ACR छुपाना नहीं चलेगा, सूचना देना ही होगी”

निजता बनाम पारदर्शिता पर अहम फैसला, कोर्ट बोला—‘पब्लिक इंटरेस्ट के नाम पर सूचना रोकना गलत’

जबलपुर। आरटीआई के अधिकार बनाम निजता के सवाल पर अहम फैसला देते हुए Madhya Pradesh High Court ने राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। जस्टिस दीपक खोत की सिंगल बेंच  ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी की ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) जैसी जानकारी को केवल “पर्सनल इंफॉर्मेशन” बताकर रोका नहीं जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें आयोग ने संबंधित अधिकारी को सूचना उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।

क्या था मामला?

मामला एक आरटीआई आवेदन से जुड़ा था, जिसमें भोपाल की अरेरा कॉलोनी में रहने वाले रिटायर्ड आईएएस अधिकारी एमके दीक्षित ने अपनी ही ACR से संबंधित जानकारी मांगी थी।

  • पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर (PIO) ने सूचना देने से इनकार किया।
  • इसके खिलाफ दाखिल की गई प्रथम अपील भी खारिज हुई।
  • लेकिन दूसरी अपील में सूचना आयोग ने जानकारी देने का आदेश दिया।

इसी आदेश को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

राज्य का तर्क—‘यह निजी जानकारी है’

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि:

  • मांगी गई जानकारी RTI Act की धारा 8(1)(j) के तहत “पर्सनल इंफॉर्मेशन” है।
  • ऐसे में इस जानकारी को आवेदक से साझा नहीं किया जा सकता।

साथ ही Bihar Public Service Commission v. Saiyed Hussain Abbas Rizwi (2012) के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि बिना “पब्लिक इंटरेस्ट” का स्पष्ट आधार बताए सूचना नहीं दी जा सकती।

कोर्ट का जवाब—ACR छुपाना नहीं, बताना जरूरी

हाईकोर्ट ने राज्य की दलीलों को खारिज करते हुए कहा:

  • ACR से जुड़ी जानकारी कर्मचारी को दी जानी चाहिए
  • यह “निजता का उल्लंघन” नहीं बल्कि उसका अधिकार है
  • यदि ACR पहले से साझा नहीं की गई, तो RTI के जरिए मांगना गलत नहीं

कोर्ट ने माना कि पारदर्शिता और जवाबदेही, निजता से ऊपर हो सकती है—यदि मामला कर्मचारी के अपने रिकॉर्ड का हो

निजता बनाम सूचना अधिकार—कोर्ट ने तय किया संतुलन

कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

  • “राइट टू प्राइवेसी” और “राइट टू इंफॉर्मेशन” दोनों संवैधानिक मूल्य हैं।
  • इन दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
  • हर मामले में “पब्लिक इंटरेस्ट” का आकलन परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया जवाब

राज्य सरकार ने जिस सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया, उस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

  • वह सिद्धांत तभी लागू होगा जब वास्तव में निजता का उल्लंघन हो।
  • इस मामले में आवेदक अपनी ही ACR मांग रहा है।
  • इसलिए “पब्लिक इंटरेस्ट” का अलग से परीक्षण जरूरी नहीं। 

अंतिम फैसला—राज्य की याचिका खारिज

हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना आयोग का आदेश सही है। उसमें कोई कानूनी खामी नहीं है। इसलिए राज्य की याचिका खारिज कर दी गई और आयोग का आदेश बरकरार रखा गया।

फैसले का बड़ा संदेश

यह फैसला साफ करता है कि सरकारी कर्मचारी अपनी ACR जैसी जानकारी पाने के हकदार हैं। RTI को “पर्सनल इंफॉर्मेशन” का बहाना बनाकर नहीं रोका जा सकता। पारदर्शिता ही प्रशासन की मजबूती है।


हाईकोर्ट का आदेश देखें      WP-10464-2010

Post a Comment

Previous Post Next Post