LAW'S VERDICT

धार के डिप्टी कलेक्टर पर 6 साल बाद थोपे गए आरोप और चार्जशीट हाईकोर्ट से रद्द

कोर्ट ने कहा- बिना ठोस आरोप और बिना भ्रष्टाचार के संकेत के हुई विभागीय कार्रवाई अवैध; प्रमोशन पर भी हटाया गया अड़ंगा

इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में प्रशासनिक मनमानी पर सख्त रुख अपनाते हुए डिप्टी कलेक्टर के खिलाफ जारी 6 साल पुराने मामले की चार्जशीट को पूरी तरह खारिज कर दिया। जस्टिस जेके पिल्लई की कोर्ट ने साफ कहा कि किसी अधिकारी द्वारा अपने क्वासी-ज्यूडिशियल कर्तव्यों के तहत दिए गए आदेश को सिर्फ ‘गलत’ बताकर उसे विभागीय कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला साफ संदेश देता है कि “प्रशासनिक अधिकारियों को उनके न्यायिक फैसलों के लिए डराकर नहीं रखा जा सकता।” अदालत ने सरकार को निर्देश दिए कि रिव्यू DPC करके याचिकाकर्ता के जॉइन्ट कलेक्टर पद के प्रमोशन पर विचार करें

क्या था मामला

याचिकाकर्ता वीरेंद्र कुमार कटारे, जो वर्तमान में धार में डिप्टी कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं, को वर्ष 2019 में एक चार्जशीट दी गई थी। उन पर आरोप थे कि उन्होंने 2013 में तहसीलदार रहते हुए भूमि नीलामी और नामांतरण से जुड़े मामलों में कथित गड़बड़ी की।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 6 साल की देरी से जारी चार्जशीट पूरी तरह अनुचित है। आरोप अस्पष्ट और आधारहीन हैं। किसी भी आरोप में भ्रष्टाचार या दुर्भावना (mala fide) का जिक्र नहीं है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व मामलों में तहसीलदार द्वारा दिए गए आदेश न्यायिक प्रकृति (quasi-judicial) के होते हैं, जिन पर इस तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

कानूनी सुरक्षा का मिला लाभ

अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में Judges (Protection) Act, 1985 के तहत अफसरों को संरक्षण मिलता है और केवल निर्णय गलत होने से अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हो सकती। कोर्ट ने Amresh Shrivastava v. State of Madhya Pradesh का हवाला देते हुए कहा कि बिना दुर्भावना या भ्रष्टाचार के आरोप के, न्यायिक कार्यों पर विभागीय कार्रवाई नहीं हो सकती।

चार्जशीट और सभी कार्रवाई रद्द 

सुनवाई के बाद दिए फैसले में अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी चार्जशीट और सभी कार्यवाही रद्द कर दीं। साथ ही सरकार को निर्देश दिए कि रिव्यू DPC करके याचिकाकर्ता के प्रमोशन पर विचार करें। याचिकाकर्ता के करियर पर इस मामले का असर न डाला जाए।

 हाईकोर्ट का आदेश देखें     W.P. No. 189/2020

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