LAW'S VERDICT

ऑनलाइन ठगी के आरोपी को जमानत नहीं, कैश में 2 लाख से अधिक का लेनदेन की IT जांच के आदेश

मप्र हाईकोर्ट ने ₹15.85 लाख की ऑनलाइन ठगी के आरोपी की तीसरी बेल भी खारिज की 

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ऑनलाइन ठगी के एक गंभीर मामले में आरोपी की तीसरी जमानत अर्जी भी खारिज कर दी है। करीब ₹15.85 लाख की धोखाधड़ी से जुड़े इस प्रकरण में जस्टिस जीएस अहलूवालिया की अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस सबूत के ‘कैश में रकम लौटाने’ और ‘समझौते’ का दावा जमानत का आधार नहीं बन सकता। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले की जाँच के आदेश इनकम टैक्स विभाग को दिए हैं, क्योंकि आरोपी का दावा था कि उसने पीड़ित को रकम कैश में लौटा दी है। अदालत ने कहा कि कैश में दी गई रकम 2 लाख रूपए से ज्यादा की है इसलिए आयकर विभाग उसकी जांच करे।

एक साल में पैसा दोगुना करने के नाम पर हुई ठगी 

पन्ना जिले के रैपुरा थाने में रूपचन्द्र जैन की शिकायत पर अपराध दर्ज हुआ था। जैन की शिकायत थी कि एक साल में रकम दोगुनी होने का लालच देकर उससे 15.85 लाख रूपए ठगे गए। पुलिस ने जांच करके उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर में रहने वाले आरोपी प्रभाकर कुमार मिश्रा को 13 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया था। इस मामले में आरोपी की दो बेल अर्जियां भी हाईकोर्ट से खारिज हो चुकी थीं। तीसरी अर्जी में आरोपी ने दावा किया कि शिकायतकर्ता रूपचन्द्र जैन से उसका समझौता हो गया है और संबंध सामान्य हो गए हैं, लेकिन अदालत ने इस दलील को अविश्वसनीय माना।

‘कैश में वापसी’ पर कोर्ट की सख्ती

हाईकोर्ट ने खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया कि आरोपी ने रकम कैश में लौटाने का दावा तो किया, लेकिन इसकी कोई स्पष्ट जानकारी या दस्तावेज पेश नहीं किए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे दावे बिना प्रमाण के स्वीकार नहीं किए जा सकते।

IT विभाग को जांच के निर्देश

अदालत ने आयकर विभाग से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए कहा कि ₹2 लाख से अधिक के कैश लेन-देन की जानकारी देना अनिवार्य है। इसी आधार पर कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिए कि मामले का पूरा रिकॉर्ड आयकर अधिकारी को भेजा जाए, ताकि संभावित टैक्स उल्लंघन की जांच की जा सके।

ऑनलाइन फ्रॉड के मामले लगातार बढ़ रहे 

अपने फैसले में कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऑनलाइन फ्रॉड के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और बेगुनाह लोगों की मेहनत की कमाई को निशाना बनाया जा रहा है। इस तरह के अपराध गंभीर आर्थिक अपराध की श्रेणी में आते हैं, इसलिए इनमें नरमी बरतना उचित नहीं है। आरोपी ने सह-आरोपियों को मिली जमानत का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि समझौते के आधार पर मिली राहत दूसरे मामलों में लागू नहीं होती। 

मेडिकल आधार भी हुआ खारिज

आरोपी ने किडनी ट्रांसप्लांट का हवाला देकर राहत मांगी, लेकिन कोर्ट ने माना कि जेल में पर्याप्त इलाज की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि, अदालत ने आरोपी को इतनी राहत जरूर दी है कि संक्रमण से बचाव के लिए जरूरी सावधानियां बरती जाएं। संभव हो तो आरोपी को अलग वार्ड में रखा जाए।  


हाईकोर्ट का आदेश देखें    MCRC-14999-2026

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