उमरिया जिले के 11 किसानों की याचिका पर हाईकोर्ट का SECL कंपनी को आदेश
जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने खनन कार्य से प्रभावित उमरिया जिले के 11 किसानों को बड़ी राहत देते हुए सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) को निर्देश दिया है कि किसानों की जमीन का स्वतंत्र सर्वे कराया जाए। यदि जमीन खेती योग्य नहीं पाई जाती है तो उसे तीन महीने के भीतर दोबारा खेती लायक बनाया जाए। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की कोर्ट ने कहा है कि गरीब किसानों को उनकी आजीविका से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनकी रोजी-रोटी कृषि भूमि से जुड़ी है। सार्वजनिक कंपनी होने के कारण उस पर अपने दायित्व निभाने की जिम्मेदारी अधिक है।
क्या था मामला
उमरिया जिले के कुडरी नरोजाबाद में रहने वाले याचिकाकर्ताओं मोहन गाडरी व 10 अन्य ने वर्ष 2015 में यह याचिका हाईकोर्ट में दायर कर आरोप लगाया था कि गांव कुडरी की कृषि भूमि के नीचे कंपनी ने अवैध डिपिलरिंग और खनन कार्य किया, जिससे उनकी जमीन खराब हो गई। किसानों ने कोर्ट से मांग की थी कि-
- जमीन को हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए।
- वर्ष 2000 से क्षतिपूर्ति ब्याज सहित मिले।
- प्रभावित परिवारों को नौकरी या पुनर्वास योजना का लाभ दिया जाए।
- वैकल्पिक रूप से नई भूमि उपलब्ध कराई जाए।
किसानों का दावा
किसानों की ओर से अधिवक्ता पुनीत एस चतुर्वेदी की दलील थी कि SECL कंपनी और किसानों के बीच 25 जून 2006 को एक समझौता हुआ था। समझौते की शर्त क्रमांक-6 के अनुसार, तीन साल बाद खनन कार्य पूरा होने पर कंपनी जमीन को फिर से मूल स्थिति में लाकर खेती योग्य बनाएगी। लेकिन कंपनी ने ऐसा नहीं किया, जिसके कारण किसान अपनी ही जमीन पर खेती नहीं कर पा रहे हैं और उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है।
कंपनी बोली- जमीन लौटा दी गई
कंपनी की ओर से कोर्ट में कहा गया कि जमीन पहले ही खेती योग्य बनाकर लौटा दी गई है। जवाब में यह भी कहा गया कि किसानों ने कंपनी के उत्तर का खंडन करने के लिए कोई जवाब दावा (rejoinder) दाखिल नहीं किया।
दोनों पक्षों पर लागू होगा समझौता: हाईकोर्ट
कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए हैं और यह विवाद तथ्यों से जुड़ा है, जिसका निपटारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में सीधे नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि किसानों ने स्वयं समझौता कर जमीन के नीचे खनन की अनुमति दी थी, इसलिए समझौते की शर्तें दोनों पक्षों पर लागू होंगी।
कोर्ट ने दिया यह अहम आदेश
हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए किसानों को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की छूट दी और निर्देश दिया कि प्राधिकरण स्वतंत्र सर्वेयर से जमीन का निरीक्षण कराए। निरीक्षण किसानों की मौजूदगी में हो। यदि जमीन खेती योग्य नहीं मिली तो रिपोर्ट मिलने के 3 महीने के भीतर उसे खेती लायक बनाया जाए। यदि जमीन पहले से ठीक पाई जाती है तो कारणयुक्त (speaking) आदेश पारित किया जाए।
किसानों के लिए संदेश
यह फैसला बताता है कि यदि खनन या औद्योगिक गतिविधियों से कृषि भूमि प्रभावित होती है, तो कंपनियां समझौते की शर्तों से बच नहीं सकतीं और जमीन की बहाली उनकी जिम्मेदारी है।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-5222-2015
