LAW'S VERDICT

डीजीपी देखें, रेप जैसे संगीन मामलों में कैसे काम कर रही नर्मदापुरम पुलिस

रेप केस में SDO(P) द्वारा की गई ‘पैरेलल जांच’ पर हैरानी जताकर हाईकोर्ट ने कहा- अफसर को बुनियादी क़ानून की जानकारी नहीं   

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने नर्मदापुरम जिले के एक रेप केस में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सख्त रुख अपनाते हुए एसडीओ(पी) वीरेंद्र कुमार मिश्रा की “पैरेलल जांच” को पूरी तरह अवैध करार दिया है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी जांच की रिपोर्ट का ट्रायल में कोई महत्व नहीं होगा और इसे विचार में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने आरोपी को जमानत देने से इंकार करके इस आदेश की एक कॉपी डीजीपी को भेजने के आदेश दिए, ताकि उन्हें पता चल सके कि नर्मदापुरम के पुलिस अफसर कैसे काम कर रहे हैं।

घर में घुसकर युवती से की थी जबरदस्ती 

मामला थाना पाथरोटा, जिला नर्मदापुरम में दर्ज रेप के अपराध से जुड़ा है। इटारसी के गोची तरौंदा में रहने वाले आरोपी अर्पित चौरे के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत गंभीर आरोप दर्ज हैं। उस पर आरोप है कि 27 फरवरी 2026 को उसने गाँव की ही एक युवती के साथ जबरदस्ती की है। आरोपी ने जमानत के लिए दलील दी कि उसके पिता की शिकायत पर एसपी नर्मदापुरम द्वारा कराई गई जांच में एसडीओ(पी), इटारसी ने 3 मार्च 2026 को रिपोर्ट दी थी, जिसमें पीड़िता के आरोपों को सही नहीं पाया गया।

“पैरेलल जांच” पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस तथाकथित जांच पर तीखे सवाल उठाए और कहा कि लंबित जांच के दौरान समानांतर (parallel) जांच कराना कानून के खिलाफ है। पहले भी कई फैसलों में पैरेलल जाँच को अवैध घोषित किया जा चुका है। ऐसी रिपोर्ट ट्रायल में कोई वैधानिक मूल्य नहीं रखती

एकतरफा जांच पर भी सवाल

कोर्ट ने यह भी पाया कि एसडीओ(पी) वीरेंद्र कुमार मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट में पीड़िता का बयान तक दर्ज नहीं किए और एकतरफा निष्कर्ष निकाल दिया। अदालत ने इसे “चौंकाने वाला” बताते हुए कहा कि यह न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। कोर्ट ने अपने आदेश में यहाँ तक कहा कि SDO(P) को बुनियादी कानून की समझ तक नहीं है। 

DGP को भेजा जाए आदेश

मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति मध्यप्रदेश पुलिस के प्रमुख (DGP) को भेजने के निर्देश दिए। इसका स्पष्ट संकेत है कि अदालत पुलिस की कार्यप्रणाली पर जवाबदेही तय करना चाहती है। 

ट्रायल कोर्ट को निर्देश 

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि SDO(P) की जांच रिपोर्ट का इस्तेमाल किसी रूप में न किया जाए। सुनवाई के दौरान कोर्ट के रुख को देखते हुए आरोपी की ओर से अर्जी वापस लिए जाने पर अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  MCRC-14418-2026

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