हाईकोर्ट ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी के हक में पारित 40 करोड़ का आर्बिट्रेशन अवार्ड किया रद्द
अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन में हाईकोर्ट की भूमिका सीमित
जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कहा कि यह मामला “इंटरनेशनल कमर्शियल आर्बिट्रेशन” की श्रेणी में आता है। चूंकि संबंधित कंपनी ऑस्ट्रेलिया में रजिस्टर्ड है, इसलिए मध्यस्थ (Arbitrator) की नियुक्ति का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट को है, न कि हाईकोर्ट को।
बेंच ने साफ किया कि अधिकार क्षेत्र (जूरिस्डिक्शन) की कमी को पक्षकारों की सहमति से भी ठीक नहीं किया जा सकता। इसलिए जब मध्यस्थ की नियुक्ति ही अवैध थी, तो पूरी आर्बिट्रेशन प्रक्रिया स्वतः शून्य हो जाती है।
वर्ल्ड बैंक प्रोजेक्ट से जुड़ा था मामला
यह विवाद राज्य की पांच प्रमुख नदी घाटियों—सिंध, केन, टोंस, चंबल और बेतवा—से जुड़े एक वर्ल्ड बैंक फंडेड प्रोजेक्ट का था। इस परियोजना के तहत जल उपभोक्ता संघों के क्षमता निर्माण और जल गुणवत्ता सुधार के लिए विशेषज्ञ परामर्श सेवाएं ली जानी थीं।
जल संसाधन विभाग ने 28 मार्च 2007 को SMEC कंपनी को यह ठेका दिया था। बाद में कार्य में लापरवाही और अनुबंध उल्लंघन के आरोप लगाते हुए विभाग ने कॉन्ट्रैक्ट समाप्त कर बैंक गारंटी जब्त कर ली।
2018 में कंपनी के पक्ष में आया था फैसला
विवाद मध्यस्थता में पहुंचा, जहां वर्ष 2018 में कंपनी के पक्ष में लगभग 8.17 करोड़ रुपये, विदेशी मुद्रा, ब्याज और 20 लाख रुपये लागत देने का अवार्ड पारित किया गया था, जो कुल मिलाकर करीब 40 करोड़ रुपये बैठता है।
लेकिन मप्र सरकार की ओर से दायर अपील में उपमहाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने दलील दी कि यह अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का मामला है, इसलिए हाईकोर्ट द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति ही अवैध है।
हाईकोर्ट ने पूरी प्रक्रिया को माना शून्य
अदालत ने सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि कंपनी ऑस्ट्रेलिया में रजिस्टर्ड है। मामला अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रेशन का है। ऐसे में हाईकोर्ट को मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार नहीं था।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने न केवल वर्ष 2018 का पूरा आर्बिट्रेशन अवार्ड रद्द कर दिया, बल्कि भोपाल की कमर्शियल कोर्ट के आदेश को भी निरस्त कर दिया।
फैसले का होगा व्यापक असर
यह फैसला केवल एक प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और सरकारी अनुबंधों से जुड़े विवादों में अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। अदालत का यह स्पष्ट संदेश है कि कानूनी प्रक्रियाओं में जूरिस्डिक्शन सर्वोपरि है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का आदेश देखें ARBITRATION APPEAL No. 266 of 2023
